End of Naxalism, a new dawn
भारत के आंतरिक सुरक्षा परिदृश्य पर छह दशकों से अधिक समय से छाया रहा नक्सलवाद अब अपने अंतिम पड़ाव पर है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 31 मार्च 2026 को नक्सलवाद को पूरी तरह समाप्त करने का लक्ष्य रखा है। यह लेख इस आंदोलन की जड़ों से लेकर उसके उत्थान और वर्तमान पतन तक की पूरी यात्रा का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है।
भाग 1: नक्सलवाद का जन्म — सिद्धांत से व्यवहार तक
कार्ल मार्क्स और कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो (1848)
नक्सलवाद की कहानी समझने के लिए हमें 1848 के यूरोप में जाना होगा। उस समय इंग्लैंड और जर्मनी में औद्योगिक क्रांति चल रही थी। मशीनों से बड़े पैमाने पर उत्पादन हो रहा था, और लोग काम की तलाश में गांवों से शहरों की ओर पलायन कर रहे थे।
कारखानों के मालिकों ने मजदूरों का बेरहमी से शोषण किया — कम वेतन पर 14-15 घंटे काम करवाए जाते थे। इसी दौरान जर्मनी के दार्शनिक कार्ल मार्क्स ने समाज में बढ़ती असमानता को देखा। 21 फरवरी 1848 को उन्होंने “द कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो” प्रकाशित किया।
मार्क्स ने लिखा कि समाज दो वर्गों में बंट चुका है — एक तरफ वे लोग जिनके पास संसाधनों और पूंजी पर कब्जा है (पूंजीपति/शासक वर्ग), और दूसरी तरफ मेहनतकश वर्ग जो दिन-रात परिश्रम करने के बाद भी गरीब है। मार्क्स का समाधान था — एक वर्गहीन समाज (क्लासलेस सोसाइटी) जिसमें निजी संपत्ति नहीं होगी और सभी संसाधनों पर सबका समान अधिकार होगा। उन्होंने यह भी कहा कि शासक वर्ग कभी अपनी सत्ता स्वेच्छा से नहीं छोड़ेगा, इसलिए गरीबों को हिंसा का सहारा लेना पड़ सकता है।
इसी विचारधारा को कम्युनिज्म कहा गया और लाल रंग इसका प्रतीक बना। यहीं से ‘लाल सलाम’ और ‘रेड कॉरिडोर’ जैसे शब्द आए।
रूसी क्रांति और भारत में कम्युनिज्म का आगमन (1917-1925)
1917 में रूस में व्लादिमीर लेनिन ने मार्क्स के सिद्धांतों को धरातल पर उतारते हुए ज़ार निकोलस द्वितीय को सत्ता से हटाया और विश्व की पहली कम्युनिस्ट सरकार बनाई। 1922 में सोवियत संघ (USSR) अस्तित्व में आया।
इस घटनाक्रम ने ब्रिटिश शासित भारत को सचेत कर दिया। अंग्रेज़ डर गए कि कहीं भारत के गरीब और किसान भी ऐसा ही विद्रोह न कर दें।
17 अक्टूबर 1920 को, भारतीय विचारक एम.एन. रॉय अपने साथियों (शौकत उस्मानी, अबानी मुखर्जी) को लेकर गुप्त रूप से ताशकंद (USSR) गए और वहीं से कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) की स्थापना की। इन लोगों को प्रशिक्षण देकर वापस भारत भेजा गया, जहाँ उन्होंने भूमिगत कम्युनिस्ट कोशिकाएँ बनाईं।
26 दिसंबर 1925 को कानपुर सम्मेलन में एस.ए. धांगे, मुजफ्फर अहमद और नलिनी गुप्ता ने CPI को भारत में औपचारिक रूप से स्थापित किया। ब्रिटिश सरकार ने 1934 में CPI पर प्रतिबंध लगा दिया और इसकी सदस्यता को गैरकानूनी घोषित कर दिया।
तेलंगाना विद्रोह और तिभागा आंदोलन (1946-1947)
1946 में भारत की आज़ादी से ठीक पहले, हैदराबाद रियासत के तेलंगाना क्षेत्र में गरीब किसानों ने निज़ाम के खिलाफ बगावत शुरू कर दी। CPI के नेताओं ने इन किसानों का समर्थन किया। लगभग 5,000 किसानों ने मिलकर सेना बनाई, जमींदारों की हवेलियों पर हमले किए, ज़मीन के रिकॉर्ड जलाए। लगभग 3,000 गाँव CPI के नियंत्रण में आ गए। 4 लाख हेक्टेयर जमीन गरीब किसानों में बाँट दी गई।
उसी समय, CPI की ‘ऑल इंडिया किसान सभा’ ने बंगाल में तिभागा आंदोलन शुरू किया — माँग थी कि पैदावार के तीन हिस्से में से एक हिस्सा जमींदार को और दो हिस्से किसान को मिलने चाहिए। यह आंदोलन काफी सफल रहा, लेकिन 15 अगस्त 1947 को भारत की आज़ादी और देश के विभाजन के कारण यह रुक गया।
भाग 2: नक्सलबाड़ी विद्रोह — आंदोलन का जन्मस्थल (1967)
आठ ऐतिहासिक दस्तावेज़
आज़ादी के बाद भी CPI ने नेहरू सरकार को “जमींदारों और पूंजीपतियों की सरकार” करार देते हुए 1948 में ‘तुरंत क्रांति’ का नारा देकर सशस्त्र विद्रोह शुरू कर दिया।
इसी दौरान CPI के दो युवा सदस्य — चारू मजूमदार और कोंडापल्ली सीतारमैया — उभरकर सामने आए। 28 जनवरी 1965 से अगले दो वर्षों में चारू मजूमदार ने आठ ऐतिहासिक दस्तावेज़ लिखे। इन दस्तावेजों में उन्होंने चरणबद्ध तरीके से लिखा:
- गरीब किसानों को देसी हथियार (छुरी, चाकू, डंडा, दाऊ) से जमींदारों, पुलिस और सरकारी अधिकारियों को मारना है
- गाँवों पर कब्जा करना है
- फिर शहरों की ओर बढ़ना है
इन दस्तावेजों को कुछ लोग ‘भारत का कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ भी कहते हैं। इन्हें गुप्त रूप से छात्रों, किसानों और मजदूरों तक पहुँचाया गया।

नक्सलबाड़ी गाँव — वह स्थान जहाँ से नाम आया (1967)
1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के सिलीगुड़ी क्षेत्र में नक्सलबाड़ी नामक गाँव था। यहाँ मुख्य रूप से संथाल, उराँव, मुंडा और राजबंशी आदिवासी समुदाय रहते थे। उनमें से लगभग 40% जमींदारों के यहाँ काम करते थे।
नक्सलबाड़ी गाँव के बाहर तीन पुलिस स्टेशन थे — नक्सलबाड़ी, खरीबारी और फंसीदेवा। यहाँ विमल किसान नाम का एक आदिवासी किसान रहता था। उसकी ज़मीन पर ईश्वर टिरकी नाम के जमींदार ने कब्ज़ा कर लिया था। विमल किसान कई बार पुलिस के पास गया, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। उसने कोर्ट में केस दायर कर दिया था।
2 मार्च 1967 को दो घटनाएँ हुईं:
- पश्चिम बंगाल में CPI चुनाव जीतकर सत्ता में आई
- सुप्रीम कोर्ट ने विमल किसान के पक्ष में फैसला सुना दिया
केस जीतने के बाद जब विमल किसान अपने खेत में खेती करने गया, तो ईश्वर टिरकी और उसके लोगों ने उसे पीटकर भगा दिया। पुलिस ने फिर कोई मदद नहीं की।
इसी क्षेत्र में CPI के स्थानीय नेता जंगाल संथाल और अंडरग्राउंड नेता कानू सान्याल सक्रिय थे। विमल किसान उनके पास पहुँचा।
CPI कार्यकर्ताओं ने 150 लोगों को इकट्ठा किया, आदिवासी किसानों को साथ जोड़ा और CPI का झंडा लेकर जमींदारों पर हमला कर दिया। उन्होंने 300 मन धान (लगभग 12 टन चावल) लूट लिया।
18 मार्च 1967 को मीटिंग में फैसला हुआ:
- इस पूरे क्षेत्र में पुलिस की एंट्री बैन होगी
- जमींदारों पर हमला कर उनकी ज़मीनें छीनी जाएंगी
- CPI की ‘तराई कृषक सभा’ की सदस्यता लेने वाले किसानों में ज़मीन बाँटी जाएगी
मार्च से मई 1967 के बीच इन तीन महीनों में कुल 100 हमले किए गए। कुल्हाड़ी, फरसे और दाऊ से जमींदार मारे गए, ज़मीन के रिकॉर्ड जला दिए गए।
पुलिस मुठभेड़ और नक्सलवाद का जन्म
23 मई 1967 को इंस्पेक्टर सोनम वांगड़ी नक्सलबाड़ी गाँव में घुस गए। जंगाल संथाल और आदिवासियों ने तीर-कमान से उन पर हमला कर दिया। दो तीर लगने से इंस्पेक्टर की मौत हो गई।
अगले दो दिनों (24-25 मई) में पुलिस ने गाँव में वापस घुसकर फायरिंग की, जिसमें 11 ग्रामीण मारे गए — जिनमें 9 महिलाएँ और 2 बच्चे थे। यह घटना आसपास के आदिवासी क्षेत्रों (फंसीदेवा, खरीबारी) में भी फैल गई।
10 अगस्त 1967 को लगभग 700 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। जंगाल संथाल पकड़े गए, लेकिन चारू मजूमदार भूमिगत हो गए।
चूँकि यह विद्रोह नक्सलबाड़ी गाँव से शुरू हुआ था, इसलिए इस तरह की गतिविधियों को ‘नक्सलवाद’ कहा जाने लगा। इस आंदोलन को चीन के माओ ज़ेडोंग से जोड़कर ‘माओवादी’ भी कहा जाता है.
भाग 3: CPI(ML) का गठन और उसका विस्तार (1969-1975)
CPI(ML) की स्थापना
1968 में कानू सान्याल गुप्त रूप से नेपाल के रास्ते चीन गए, जहाँ उन्होंने माओ की ‘लाल किताब’ से राजनीतिक और सैन्य प्रशिक्षण लिया। जनवरी 1969 में वापस लौटकर उन्होंने चारू मजूमदार से मिलकर रणनीति बनाई।
2 अप्रैल 1969 को (लेनिन की 100वीं जयंती) कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) — CPI(ML) की स्थापना हुई। इस पार्टी ने चुनावी राजनीति का पूर्ण बहिष्कार कर सशस्त्र संघर्ष को ही एकमात्र रास्ता बताया। उनके नारे थे:
- “चीन का रास्ता हमारा रास्ता”
- “चीन का चेयरमैन हमारा चेयरमैन”
- “जिनके हाथों में वर्ग दुश्मन का खून नहीं, वे कम्युनिस्ट कहलाने के लायक नहीं”
17,000 से अधिक लोगों ने CPI(ML) ज्वाइन किया, और यह पार्टी आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और बिहार में नक्सलवाद का केंद्र बन गई।
ऑपरेशन स्टीपलचेस (1971-1972) और चारू मजूमदार की मृत्यु
अगस्त 1970 में कानू सान्याल गिरफ्तार हो गए। जुलाई-अगस्त 1971 में ऑपरेशन स्टीपलचेस चलाया गया, जिसमें लगभग 20,000 नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया।
16 जुलाई 1972 को पुलिस ने चारू मजूमदार को कोलकाता के एंटली इलाके के 113 बेलियाघाटा रोड से गिरफ्तार किया। 28 जुलाई 1972 को लाल बाजार सेंट्रल लॉकअप में उनकी मृत्यु हो गई। सरकार ने कहा कि उन्हें पहले से TB था और कार्डियक अरेस्ट से मौत हुई, लेकिन नक्सली इसे पुलिस हिरासत में हत्या मानते हैं। कानू सान्याल ने भी बाद में जेल में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।
1973-74 में सेना और CRPF ने और अभियान चलाकर नक्सलियों पर बड़ा प्रहार किया। 1975 में इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाकर MISA (मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट) के तहत बचे-खुचे नक्सलियों को भी जेल में डाल दिया। नक्सलवाद कमज़ोर पड़ गया.
भाग 4: नक्सलवाद का पुनरुत्थान — पीपुल्स वॉर ग्रुप (PWG) का जन्म (1977-1980)
जेल से रिहाई और नई रणनीति
21 मार्च 1977 को आपातकाल हटा। 24 मार्च को मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। उन्होंने सिविल लिबर्टी बहाल करने और राजनीतिक बंदियों को रिहा करने का वादा किया। जेल में बंद नक्सलियों ने हथियार न उठाने का वादा करते हुए रिहाई पा ली।
लेकिन कोंडापल्ली सीतारमैया (जो पहले CPI(ML) के सदस्य थे) और उनके साथियों ने धोखा दिया। उन्होंने रिहा होते ही फिर से भूमिगत होकर 30-40 छोटे नक्सल समूहों को एकजुट करना शुरू कर दिया।
22 अप्रैल 1980 को कोंडापल्ली सीतारमैया ने पीपुल्स वॉर ग्रुप (PWG) की स्थापना की। उन्होंने अपनी रणनीति बदली — अब वे शहरों और गाँवों के बजाय घने जंगलों में अपने अड्डे बनाने लगे।
घने जंगल — नक्सलियों का नया गढ़
भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 12% (4 करोड़ हेक्टेयर) घना जंगल था, जहाँ लगभग 5% आदिवासी आबादी रहती थी। ये जंगल इतने घने थे कि इनकी मैपिंग तक नहीं हो पाती थी। यहाँ न सड़कें थीं, न स्कूल, न अस्पताल, न पुलिस व्यवस्था।
आदिवासियों के लिए जंगल, ज़मीन और पानी ही उनकी पहचान और संस्कृति थी। अंग्रेजों के ज़माने से ही उनका शोषण हो रहा था। भारत के संविधान के पांचवीं अनुसूची (5th Schedule) के तहत ‘ट्राइब्स एडवाइज़री काउंसिल’ बनाने का प्रावधान था, जिसमें 75% आदिवासी हों और उनके क्षेत्रों के फैसले वे खुद करें। लेकिन ये सब कागजों में ही रहा।
1980 में सरकार ने वन संरक्षण अधिनियम (Forest Conservation Act) भी लाया, जिसके तहत अब जंगल से लकड़ी, पत्ते, फल लाने के लिए भी वन अधिकारी से अनुमति लेनी पड़ती थी। इससे आदिवासी और अधिक नाराज़ हो गए।
आदिवासियों का विश्वास जीतना
PWG ने आदिवासियों का विश्वास जीतने के लिए कड़ी मेहनत की:
- उन्होंने गोंडी भाषा सीखी
- आदिवासियों के साथ मिलकर उनकी समस्याएँ सुनीं
- उन्हें सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करना सिखाया
परिणाम अच्छे आए — सरकार ने आदिवासियों को जंगल में मवेशी ले जाने, लकड़ी लाने और शिकार करने की अनुमति दे दी।
तेंदू पत्ता (बीड़ी बनाने के लिए) के 100 बंडल के 4 रुपये थे। PWG के प्रदर्शनों के बाद यह बढ़कर 25 रुपये हो गया।
एक वन अधिकारी ने आदिवासी लड़की के साथ छेड़खानी की तो नक्सलियों ने उसे पेड़ से बाँधकर आदिवासी महिलाओं से उसके मुँह पर थूकवाया। यह घटना आदिवासियों में बहुत मशहूर हुई और उन्होंने खुलकर नक्सलियों का समर्थन करना शुरू कर दिया.
समानांतर सरकार (Parallel Government)
1990 तक नक्सलियों ने जंगलों में अपनी समानांतर सरकार चला दी। उन्होंने अपनी अदालतें और कानून व्यवस्था बना ली। ज़मीन या शादी का कोई विवाद होता तो आदिवासी नक्सलियों के पास जाते थे।
PWG का विस्तार इन राज्यों में हुआ:
- आंध्र प्रदेश (विशेषकर तेलंगाना क्षेत्र — वारंगल, नालगोंडा, करीमनगर)
- तेलंगाना (नया राज्य बनने के बाद)
- छत्तीसगढ़ (बस्तर, दंतेवाड़ा, सुकमा, बीजापुर)
- ओडिशा (मलकानगिरि, कोरापुट)
- महाराष्ट्र (गढ़चिरौली)
- झारखंड
- बिहार (गया, औरंगाबाद, जहानाबाद)
- पश्चिम बंगाल (मिदनापुर, पुरुलिया, बाँकुड़ा)
- केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से
अंतर्राष्ट्रीय संपर्क
PWG ने विदेशी आतंकी संगठनों से भी हाथ मिलाया:
- श्रीलंका के LTTE (लिट्टे) से संपर्क कर वहाँ गोरिल्ला युद्ध, IED बम बनाना और लैंडमाइन प्लांट करना सीखा। LTTE ने उन्हें 50-60 AK-47 राइफलें भी दीं
- असम के उल्फा (ULFA) से भी समन्वय किया
ये सारे क्षेत्र बाद में ‘रेड कॉरिडोर’ कहलाए.
भाग 5: नक्सलवाद अपने चरम पर — लाल आतंक का दौर (1991-2010)
उदारीकरण और निजी कंपनियों का आगमन
1991 में भारत में आर्थिक उदारीकरण शुरू हुआ। भारत के कुल कोयला उत्पादन का 85% आदिवासी क्षेत्रों से आता था। निजी कंपनियाँ इन इलाकों में माइनिंग के लिए घुसने लगीं। आदिवासी बेचैन हो गए — उनकी ज़मीनें जा रही थीं, उनकी आजीविका खतरे में थी।
पंचायत एक्सटेंशन टू स्केड्यूल्ड एरिया एक्ट (PESA) 1996
सरकार ने PESA एक्ट 1996 बनाया, जिसके तहत आदिवासी क्षेत्रों में कोई भी विकास परियोजना या माइनिंग करने से पहले ग्राम सभा की अनुमति लेना अनिवार्य था।
लेकिन भ्रष्टाचार इतना अधिक था कि निजी कंपनियाँ बिना अनुमति के ही घुस जातीं। आदिवासी एनजीओ कोर्ट गए। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि शेड्यूल्ड एरिया में प्राइवेट कंपनियाँ नहीं घुस सकतीं।
नक्सलियों का उग्र रूप
प्रमुख हमले:
- नैनो कार प्लांट (पश्चिम बंगाल) — टाटा को अपना प्लांट गुजरात शिफ्ट करना पड़ा। 2,000 प्रत्यक्ष और 10,000 अप्रत्यक्ष नौकरियाँ गईं, 1,000 करोड़ का निवेश डूबा।
- पोहांग आयरन एंड स्टील (दक्षिण कोरिया) — ओडिशा में 12 बिलियन डॉलर (भारत के इतिहास का दूसरा सबसे बड़ा FDI) का प्लांट लगाने आई थी। नक्सलियों ने इतना कोहराम मचाया कि कंपनी भारत से चली गई।
- 1 अक्टूबर 2003 — चंद्रबाबू नायडू पर हमला: आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू तिरुपति से तिरुमाला जा रहे थे। नक्सलियों ने रास्ते में 17 IED बम लगा दिए। उनकी कार हवा में उड़ गई। नायडू बाल-बाल बचे (कॉलरबोन फ्रैक्चर).
- जेहानाबाद जेल हमला (बिहार) — नक्सलियों ने जेल पर हमला कर 389 कैदियों को छुड़ा लिया।
- 70 ट्रकों में आग (झारखंड) — एक साथ 70 ट्रकों में आग लगा दी गई।
- 11 बोगियों में आग (मालगाड़ी) — मालगाड़ी की 11 बोगियों को एक साथ जलाया गया।
नक्सलियों का वार्षिक राजस्व
PWG के सेक्रेटरी के कंप्यूटर से मिले आंकड़ों के अनुसार, नक्सलियों की वार्षिक वसूली (जनता टैक्स, लेवी, रंगदारी, चरस-अफीम का कारोबार) लगभग 240 करोड़ रुपये थी। हर ठेके पर 20% ‘जनता टैक्स’ वसूला जाता था।
सीपीआई (माओवादी) का गठन (2004)
सितंबर 2004 में PWG और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (MCC) का विलय हुआ और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) — CPI (Maoist) का गठन हुआ.
इस पार्टी ने 8 विभाग बनाए — सेना, किसानों के लिए बीज और ग्रीन बैंक, मेडिकल यूनिट, मोबाइल स्कूल, समानांतर अदालतें, ब्याज-मुक्त ऋण, आदि।
रेड कॉरिडोर अब 180 जिलों में फैल चुका था। 92,000 वर्ग किलोमीटर (भारत की 40% ज़मीन) पर नक्सली अपना अलग झंडा और अलग सरकार चला रहे थे.
भाग 6: सलवा जुड़म — विवादित जनआंदोलन (2005-2011)
सलवा जुड़म का गठन
2005 में छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह (भाजपा) और कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा ने मिलकर सलवा जुड़म (गोंडी भाषा में अर्थ: ‘शांति मार्च’) नामक एक निजी सेना बनाई। इसमें स्थानीय आदिवासी युवाओं को ‘स्पेशल पुलिस ऑफिसर (SPO)’ या ‘कोया कमांडो’ बनाकर नक्सलियों के खिलाफ लड़ने के लिए प्रशिक्षित और हथियारबंद किया गया।
3 लाख लोग विस्थापित हुए, और मानवाधिकारों के उल्लंघन के गंभीर आरोप लगे। दूसरी तरफ, नक्सलियों ने सलवा जुड़म से जुड़े लोगों को निशाना बनाकर मारना शुरू कर दिया। यह एक खूनी गृहयुद्ध जैसी स्थिति बन गई।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला (जुलाई 2011)
5 जुलाई 2011 को, नंदिनी सुंदर और अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए, सुप्रीम कोर्ट की पीठ (जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी और जस्टिस सुरिंदर सिंह निज्जर) ने सलवा जुड़म को असंवैधानिक और गैरकानूनी घोषित करते हुए तुरंत बंद करने का आदेश दिया।
कोर्ट ने कहा, “आप किसी नागरिक को हथियार देकर उसे मारने की अनुमति नहीं दे सकते। ऐसा करना आपको IPC की धारा 302 (हत्या) का सह-अपराधी बनाएगा।”
कोर्ट ने निर्देश दिया कि:
- सभी SPOs से हथियार वापस लिए जाएँ
- सलवा जुड़म तुरंत समाप्त हो
- मानवाधिकार उल्लंघनों की जाँच हो
सलवा जुड़म के संस्थापक महेंद्र कर्मा को 25 मई 2013 को नक्सलियों ने मार दिया.
सुदर्शन रेड्डी विवाद
2011 के इसी फैसले ने बाद में राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया। जब सुदर्शन रेड्डी को विपक्ष (इंडिया गठबंधन) का उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया गया, तो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने आरोप लगाया कि उस फैसले ने नक्सलियों को “बचाया” और अगर वह फैसला नहीं आया होता तो नक्सलवाद 2020 तक खत्म हो जाता.
भाग 7: नक्सलवाद का पतन — सरकार की तीन-आयामी रणनीति (2014-वर्तमान)
राजनीतिक इच्छाशक्ति में बदलाव
2014 में नरेंद्र मोदी सरकार के आने के बाद नक्सलवाद से निपटने की रणनीति पूरी तरह बदल गई। स्पष्ट नीति बनाई गई: “जो हथियार डालेगा, उससे बात होगी; जो गोली चलाएगा, उसे गोली से जवाब मिलेगा।”
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद को पूरी तरह समाप्त करने का लक्ष्य रखा है
ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट (2025)
अप्रैल-मई 2025 में तेलंगाना-छत्तीसगढ़ सीमा पर करेगुट्टालू पहाड़ियों (Black Forest) पर सबसे बड़ा ऑपरेशन चलाया गया।
पृष्ठभूमि: यह पहाड़ी 50 किमी लंबी और 37 किमी चौड़ी है। नक्सलियों ने यहाँ अपना स्थायी कैंप बनाया था — सोलर लाइट, आईडी बनाने की फैक्ट्रियाँ, 5 साल का अनाज, 400-500 कैडर। वे यहाँ से 5 साल तक लड़ सकते थे।
चुनौतियाँ: 45 डिग्री तापमान, पत्थर 10 बजते ही गर्म हो जाते थे, हर जवान को प्रतिदिन मात्र 300 ग्राम पानी मिलता था।
परिणाम: 21 दिनों तक ऑपरेशन चला। 30+ माओवादी मारे गए, बाकी नीचे उतरते ही मारे गए या सरेंडर कर दिए। भारी मात्रा में हथियार और विस्फोटक जब्त किए गए.
फरवरी 2026 में ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट-2 शुरू किया गया, जिसमें 2,000 से अधिक सुरक्षाकर्मी लगे हैं.
विकास और शासन का विस्तार
सरकार ने ‘होल ऑफ गवर्नमेंट अप्रोच’ अपनाया:
बुनियादी ढाँचा:
- 17,589 किमी सड़कों का निर्माण (12,000 किमी पूरा)
- 5,000 मोबाइल टावर (6,000 करोड़ रुपये की लागत)
- 8,000 और 4G टॉवर बनाने का आदेश
बैंकिंग और वित्त:
- 1,804 नई बैंक शाखाएँ
- 1,321 ATM
- 37,850 बैंकिंग कॉरेस्पोंडेंट
- 625 डाकघर
शिक्षा और कौशल:
- 269 एकलव्य आदर्श विद्यालय
- 46 ITI, 49 सेल डेवलपमेंट सेंटर, 16 कौशल विकास केंद्र
- 800 करोड़ रुपये का खर्च
स्वास्थ्य:
- जगदलपुर में 240 बिस्तरों का सुपर स्पेशलिटी अस्पताल
- 212 करोड़ रुपये के स्वास्थ्य कार्य
सुरक्षा:
- 596 फोर्टिफाइड पुलिस स्टेशन
- 406 नए CAPF कैंप (पिछले 6 साल में)
- 68 नाइट लैंडिंग हेलीपैड
- 400 बुलेट-प्रूफ, ब्लास्ट-प्रूफ गाड़ियाँ
आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति
सरकार की ‘सरेंडर पॉलिसी’ के तहत:
- आत्मसमर्पण पर 5 लाख रुपये की प्रोत्साहन राशि
- सामूहिक सरेंडर पर दोगुनी राशि
- मुफ्त मोबाइल, कौशल प्रशिक्षण, टूलकिट
- 36 महीने तक प्रति माह 1,000 रुपये (हाल ही में 100 रुपये बताया गया, संभवत: पुराना डेटा)
- प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान
परिणाम — आँकड़ों में सफलता
हालिया आँकड़े (2024-26 तक):
- 706 नक्सली मुठभेड़ों में मारे गए
- 2,218 गिरफ्तार
- 4,839 ने आत्मसमर्पण किया
नेतृत्व का सफाया:
केंद्रीय समिति और पोलित ब्यूरो के 21 सदस्यों में से 12 मारे गए, 7 सरेंडर किए, 1 गिरफ्तार, 1 फरार
- बसव राजू (महासचिव, 49 वर्ष एक्टिव) — न्यूट्रलाइज़
- हिडमा (28 वर्ष एक्टिव, 36-27 लोगों को मार चुका था) — न्यूट्रलाइज़
- गणेश उईके (44 वर्ष एक्टिव) — न्यूट्रलाइज़
- कादरी सत्यनारायण राव रेड्डी (46 वर्ष एक्टिव) — न्यूट्रलाइज़
- वेणुगोपाल (46 वर्ष) — आत्मसमर्पण
- वासुदेव (36 वर्ष) — आत्मसमर्पण
- टिपरी तिरुपति (44 वर्ष) — आत्मसमर्पण
प्रभावित क्षेत्रों में कमी:
- नक्सल प्रभावित जिले: 126 (2014) → 0 (वर्तमान)
- अति प्रभावित जिले: 35 (2014) → शून्य
- नक्सल घटनाएँ दर्ज करने वाले थाने: 350 → 7
- 2010 में 1,936 घटनाएँ → 2025 में 88% की कमी
- 2010 में 1,005 मौतें → 2025 में 90% की कमी
भाग 8: मानवीय पक्ष — सरेंडर कैंप की दास्तान
एक नक्सली बच्ची की कहानी
हाल ही में एक रिहैबिलिटेशन कैंप में एक लड़की को नेल पॉलिश दी गई। वह नेल पॉलिश लगाते-लगाते फूट-फूट कर रोने लगी। पूछने पर उसने बताया:
“सात साल की थी जब ये लोग मुझे उठा ले गए। तब से पैंट-शर्ट और बूट में घूम रही हूँ। आज पहली बार जीवन में नेल पॉलिश लगाई है। मैंने कभी जीवन नहीं देखा।”
एक और लड़की ने कहा:
“32 साल की उम्र तक मैंने कभी मेंहदी नहीं लगाई थी।”
कुछ सरेंडर किए गए लोग अपने माँ-बाप को पीटने लगते हैं:
*”क्यों दे दिया हमें नक्सलियों को? हमारा जीवन बर्बाद कर दिया। 25-30 साल तक न पढ़े, न लिखे, निरक्षर रहे, पशुओं की तरह दौड़ते रहे।”*
ये वे लोग हैं जिन्हें नक्सलियों ने अपना बचपन, अपनी शिक्षा, अपना मानवीय चेहरा छीन लिया।
नक्सलवाद भारत के लिए छह दशकों का एक कालखंड रहा है जिसने 20,000 से अधिक लोगों की जान ली है — सुरक्षाकर्मी, नक्सली, और सबसे दुखद, आम आदिवासी नागरिक जो इन दो पक्षों के बीच फँसे रहे।
नक्सलवाद की जड़ें सिद्धांत में थीं — कार्ल मार्क्स से लेनिन, माओ से चारू मजूमदार तक। लेकिन ज़मीन पर यह आदिवासियों के शोषण, उनके जंगलों की लूट, और एक खूनी समानांतर सरकार के रूप में बदल गया।
आज का भारत इस समस्या का समाधान विकास और सुरक्षा के संतुलन से कर रहा है। जहाँ कभी नक्सली बंदूक की नली से शासन चलाते थे, वहाँ आज स्कूल, अस्पताल, सड़कें और बैंक खुल रहे हैं।
31 मार्च 2026 वह तारीख है, जब भारत लगभग 60 साल पुराने इस सशस्त्र विद्रोह को इतिहास के पन्नों में डाल दीया। लेकिन सच्ची जीत तब होगी जब जिन हाथों में कभी बंदूकें थीं, वे हाथ किताबें और औज़ार पकड़ेंगे, और जिन आँखों ने कभी सिर्फ खून देखा, वे आँखें अपने बच्चों का भविष्य देखेंगी।
