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अमेरिका में H-1B वीज़ा पर 1 लाख डॉलर की फीस रद्द, कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन के फैसले को बताया अवैध

सितम्बर 19, 2026 (अंतिम अद्यतन: जून 9, 2026) 1 मिनट पढ़ें
Immigration and visa ruling debate

वॉशिंगटन। अमेरिका की एक संघीय अदालत ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को बड़ा झटका देते हुए H-1B वीज़ा पर लगाई गई 1 लाख डॉलर की अतिरिक्त फीस को अवैध करार दे दिया है। अदालत ने कहा कि कांग्रेस की मंजूरी के बिना इस तरह का शुल्क लागू करना प्रशासन के अधिकार क्षेत्र से बाहर है।

अमेरिकी जिला न्यायाधीश लियो सोरोकिन ने सोमवार को अपना फैसला सुनाते हुए ट्रंप प्रशासन की उस नीति को रद्द कर दिया, जिसके तहत नए H-1B वीज़ा आवेदनों पर 100,000 डॉलर का शुल्क लगाया गया था। इस नीति को अमेरिका के 20 राज्यों ने अदालत में चुनौती दी थी।

अपने 42 पन्नों के फैसले में न्यायाधीश ने कहा कि संघीय कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो प्रशासन को H-1B वीज़ा आवेदनों पर इस स्तर का अतिरिक्त शुल्क लगाने की अनुमति देता हो। अदालत ने माना कि यह कदम कांग्रेस के अधिकारों का अतिक्रमण था।

हालांकि अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (DHS) ने फैसले की आलोचना करते हुए इसे न्यायिक सक्रियता का उदाहरण बताया है। विभाग का कहना है कि यह फैसला प्रशासन की आव्रजन सुधार नीतियों में अनावश्यक हस्तक्षेप है।

क्या है H-1B वीज़ा?
H-1B वीज़ा अमेरिका का एक विशेष कार्य वीज़ा कार्यक्रम है, जिसे 1990 में शुरू किया गया था। इसके तहत अमेरिकी कंपनियां विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग, गणित, चिकित्सा और अन्य विशेषज्ञ क्षेत्रों में विदेशी पेशेवरों को अस्थायी रूप से नियुक्त कर सकती हैं।

वर्तमान नियमों के अनुसार हर साल 65,000 नए H-1B वीज़ा जारी किए जाते हैं। इसके अतिरिक्त अमेरिकी विश्वविद्यालयों से उच्च डिग्री प्राप्त करने वाले आवेदकों के लिए 20,000 अतिरिक्त वीज़ा उपलब्ध होते हैं।

सामान्य तौर पर कंपनियों को H-1B आवेदन के लिए 1,700 डॉलर से 4,500 डॉलर तक की फीस देनी पड़ती है। लेकिन ट्रंप प्रशासन ने पिछले वर्ष इस राशि के अलावा 100,000 डॉलर की अतिरिक्त फीस लगाने का आदेश जारी किया था।

भारतीय पेशेवरों को बड़ी राहत
यह फैसला भारतीय पेशेवरों और आईटी उद्योग के लिए विशेष महत्व रखता है। अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा (USCIS) के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2024 में स्वीकृत H-1B वीज़ा धारकों में लगभग 71 प्रतिशत भारतीय नागरिक थे। चीन 11.7 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ दूसरे स्थान पर रहा।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह अतिरिक्त शुल्क लागू रहता, तो अमेरिका में काम करने के इच्छुक हजारों भारतीय पेशेवरों और उन्हें नियुक्त करने वाली कंपनियों पर भारी वित्तीय बोझ पड़ता।

अदालत के इस फैसले से फिलहाल H-1B वीज़ा प्रणाली पहले की तरह जारी रहेगी और विदेशी कुशल कर्मचारियों के लिए अमेरिका में रोजगार के अवसरों पर पड़ने वाला अतिरिक्त आर्थिक दबाव समाप्त हो जाएगा।

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