नई दिल्ली – दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था संकट के उस मोड़ पर खड़ी है, जहां से वापसी संभव नहीं दिखती। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का ईरान युद्ध से बाहर निकलना सिर्फ एक सैन्य रणनीति नहीं, बल्कि वैश्विक वित्तीय व्यवस्था के लिए एक टर्निंग प्वाइंट है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण बरकरार रखा और खाड़ी देशों को डॉलर छोड़ने पर मजबूर किया, तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था का पोंजी स्कीम की तरह पतन हो सकता है और सड़कों पर क्रांति आ सकती है ।
पेट्रोडॉलर व्यवस्था की नींव क्यों हिल रही है?
प्रोफेसर जियांग के अनुसार, अमेरिकी अर्थव्यवस्था एक विशाल पोंजी स्कीम की तरह काम करती है, जो खाड़ी देशों के अमेरिकी टेक्नोलॉजी में निवेश पर निर्भर है । जब तक खाड़ी देश तेल बेचकर डॉलर कमाते हैं और उसे अमेरिकी बॉन्ड व शेयरों में लगाते हैं, तब तक यह व्यवस्था चलती है। लेकिन ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए इस बार्गेन को तोड़ दिया है।
जेफ करी (Jeff Currie), गोल्डमैन सैक्स के पूर्व कमोडिटी प्रमुख और डॉलर व्यवस्था के अंदरूनी जानकार, ने साफ कहा कि होर्मुज का नियंत्रण ईरान को सौंपना कोई सामरिक पीछे हटना नहीं है—यह अमेरिका की वैश्विक सत्ता का औपचारिक अंत और डॉलर की रिजर्व करेंसी के रूप में मौत है ।
करी ने चेतावनी दी कि पेट्रोडॉलर व्यवस्था का मूल अनुबंध था—अमेरिका समुद्री रास्ते खुले रखेगा और तेल उत्पादकों को सुरक्षा देगा, बदले में पेट्रो-राज्य अपनी कमाई अमेरिकी ट्रेजरी और वॉल स्ट्रीट में लगाएंगे। “यह भव्य सौदा अब तोड़ा जा चुका है,” करी ने कहा ।
43 दिन: अमेरिका के पास बस इतना ही तेल बचा है
Bank of America की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के पास अब कच्चे तेल की सिर्फ 43 दिनों की आपातकालीन बफर बची है—जो 45 साल का न्यूनतम स्तर है । रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) 1983 के बाद अपने सबसे कमजोर स्तर पर है ।
यह आंकड़ा बताता है कि अगर होर्मुज से तेल आना पूरी तरह बंद हो जाता है, तो अमेरिका के पास बिना नए आयात के सिर्फ 43 दिनों का समय होगा। “एक बार यह खत्म हो गया, तो खत्म हो गया” —यह चेतावनी अमेरिकी सरकार को दी जा रही है ।
जैमी डिमन की चेतावनी: होर्मुज पर ईरान का “गला”
JPMorgan Chase के CEO जैमी डिमन ने अपने शेयरधारकों को लिखे पत्र में कहा कि ईरान ने 45 साल से अधिक समय से “होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपना गला” रखा हुआ था । उन्होंने ट्रंप प्रशासन से कहा कि “इस काम को खत्म करो और सही तरीके से खत्म करो” ।
डिमन ने चेतावनी दी कि ईरान युद्ध से तेल और वस्तुओं की कीमतों में बड़ा झटका लग सकता है, जिससे मुद्रास्फीति चिपचिपी हो जाएगी और ब्याज दरें बाजार की उम्मीद से अधिक बढ़ सकती हैं । उन्होंने कहा, “अगर ईरान ने कभी परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल हासिल कर ली, तो यह खतरा तुरंत दूर किया जाना चाहिए। परमाणु प्रसार मानवता के भविष्य के लिए सबसे बड़ा खतरा है” ।
पेट्रोडॉलर सिस्टम पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?
दशकों से अंतरराष्ट्रीय तेल व्यापार में डॉलर की केंद्रीय भूमिका रही है। तेल की कीमत और भुगतान में डॉलर का व्यापक इस्तेमाल अमेरिकी मुद्रा की वैश्विक मांग को मजबूत करता है।
इसी व्यवस्था को आम तौर पर “पेट्रोडॉलर सिस्टम” कहा जाता है।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि पेट्रोडॉलर कोई एक औपचारिक संधि या एकल संस्था नहीं है। यह तेल व्यापार, डॉलर-आधारित वित्तीय व्यवस्था, अमेरिकी ट्रेजरी बाजार और वैश्विक केंद्रीय बैंकों के डॉलर भंडार से बनी एक व्यापक आर्थिक संरचना है।
यदि बड़े तेल निर्यातक भविष्य में तेल का अधिक हिस्सा दूसरी मुद्राओं में बेचने लगते हैं, तो डॉलर की अंतरराष्ट्रीय मांग पर दबाव बढ़ सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि डॉलर तुरंत दुनिया की रिजर्व करेंसी की स्थिति खो देगा।
अमेरिका के तेल भंडार पर भी दबाव
इस पूरे संकट के बीच अमेरिकी Strategic Petroleum Reserve यानी SPR पर भी नजरें टिकी हुई हैं।
हालिया रिपोर्टों में Bank of America Global Research के आंकड़ों के हवाले से कहा गया है कि अमेरिकी कच्चे तेल की कुल उपलब्धता—Strategic Petroleum Reserve को शामिल करने पर—लगभग 43 दिनों के बराबर रह गई है, जबकि लंबे समय का औसत करीब 65 दिन बताया गया है। यह स्तर 1980 के दशक के बाद सबसे निचले स्तरों में बताया जा रहा है।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है: 43 दिन का आंकड़ा यह नहीं बताता कि 43 दिन बाद अमेरिका के पास तेल खत्म हो जाएगा। यह एक अनुमानित आपूर्ति-कुशन का माप है और वास्तविक स्थिति घरेलू उत्पादन, आयात, रिफाइनरी क्षमता, अन्य देशों से आपूर्ति और सरकारी भंडार प्रबंधन पर निर्भर करती है।
फिर भी, युद्ध के दौरान रिजर्व में लगातार कमी होना अमेरिकी ऊर्जा सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है।
क्या पेट्रोडॉलर खत्म होते ही अमेरिका में आर्थिक तबाही आ जाएगी?
यही वह दावा है जिसे लेकर सबसे ज्यादा सावधानी जरूरी है।
कुछ विश्लेषकों का तर्क है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था की ताकत का एक हिस्सा इस बात से आता है कि दुनिया भर में डॉलर की मांग बनी रहती है। यदि तेल उत्पादक देश डॉलर के बजाय दूसरी मुद्राओं में बड़े पैमाने पर कारोबार करने लगें और अपनी डॉलर परिसंपत्तियों को कम करें, तो अमेरिकी वित्तीय बाजारों और Treasury securities की मांग पर असर पड़ सकता है।
लेकिन अमेरिका की आर्थिक ताकत केवल तेल व्यापार पर आधारित नहीं है।
डॉलर की वैश्विक भूमिका के पीछे अमेरिकी वित्तीय बाजारों की गहराई, Treasury market की विशालता, अमेरिकी संस्थानों पर भरोसा, वैश्विक व्यापार और डॉलर-आधारित बैंकिंग व्यवस्था जैसे कई कारक हैं।
इसलिए “पेट्रोडॉलर खत्म = अमेरिकी अर्थव्यवस्था खत्म” एक बहुत सरल निष्कर्ष होगा।
असली खतरा क्या है?
असल खतरा शायद डॉलर का अचानक अंत नहीं, बल्कि वैश्विक वित्तीय व्यवस्था का धीरे-धीरे बहुध्रुवीय होना है।
अगर खाड़ी देश और दूसरे ऊर्जा निर्यातक:
तेल के भुगतान में यूरो, युआन या अन्य मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़ाते हैं,
डॉलर भंडार का हिस्सा घटाते हैं,
वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों का इस्तेमाल करते हैं,
और अमेरिका की सुरक्षा गारंटी पर पहले जैसा भरोसा नहीं रखते,
तो लंबे समय में डॉलर की वैश्विक मांग प्रभावित हो सकती है।
इसी तरह, यदि होर्मुज़ जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा अमेरिका के नियंत्रण से बाहर होती है, तो यह अमेरिका की भू-राजनीतिक विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर सकता है।
दुनिया के लिए इसका क्या मतलब होगा?
अगर होर्मुज़ संकट लंबा चलता है, तो सबसे बड़ा असर ऊर्जा कीमतों पर होगा।
तेल महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ेगी। इससे खाद्य पदार्थों से लेकर औद्योगिक उत्पादन और विमानन तक कई क्षेत्रों पर दबाव आ सकता है।
Reuters ने भी ईरान संघर्ष के संदर्भ में चेतावनी दी है कि लंबे समय तक चलने वाला संकट महंगाई और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर दबाव बढ़ा सकता है।
एशिया विशेष रूप से संवेदनशील है क्योंकि होर्मुज़ से गुजरने वाले तेल का बड़ा हिस्सा एशियाई बाजारों की ओर जाता है।
निष्कर्ष: डॉलर की मौत नहीं, लेकिन एक बड़े बदलाव की शुरुआत?
“Trump leaves Iran war and the petrodollar dies forever” जैसी हेडलाइन निश्चित रूप से बेहद प्रभावशाली है, लेकिन वास्तविक आर्थिक तस्वीर इससे कहीं अधिक जटिल है।
अमेरिका का ईरान से युद्ध, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ की सुरक्षा, खाड़ी देशों की रणनीति और वैश्विक तेल व्यापार—ये सभी मिलकर आने वाले वर्षों में डॉलर की भूमिका को प्रभावित कर सकते हैं।
डॉलर के अगले दिन खत्म हो जाने की संभावना नहीं है। लेकिन अगर ऊर्जा व्यापार में लगातार डी-डॉलराइजेशन बढ़ता है और अमेरिका की सुरक्षा भूमिका पर भरोसा कमजोर होता है, तो वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में अमेरिकी प्रभुत्व धीरे-धीरे कम हो सकता है।
यही इस पूरे संकट का सबसे बड़ा आर्थिक सवाल है—
क्या होर्मुज़ केवल तेल का रास्ता है, या फिर यह अमेरिकी वैश्विक प्रभुत्व की सबसे महत्वपूर्ण समुद्री कड़ी भी है?
पेट्रोडॉलर की मौत की घोषणा शायद अभी नहीं हुई है, लेकिन उसका शव अब बाजारों में तैर रहा है।
