वैश्विक अर्थव्यवस्था इन दिनों एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल होता जा रहा है। चीनी-कनाडाई शिक्षाविद् और भू-राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर जियांग ज्यूकिन (Jiang Xueqin) ने कुछ महीने पहले एक बड़ा दावा किया था। उन्होंने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को एक “पोंजी स्कीम” (विशाल घोटाला) करार दिया था, जो खाड़ी देशों (GCC) के पैसे पर टिकी है। उनकी चेतावनी थी कि अगर यह पैसा आना बंद हुआ तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था ढह सकती है । आज का घटनाक्रम बताता है कि प्रोफेसर जियांग शायद बहुत जल्दी सही साबित हो रहे हैं।
अमेरिकी अर्थव्यवस्था: ‘पोंजी स्कीम’ का खेल
प्रोफेसर जियांग का तर्क है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था खाड़ी देशों के निवेश पर निर्भर है, जो अपने तेल के पैसे को अमेरिकी टेक कंपनियों, खासकर AI और डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स में लगाते हैं । यह पैसा ही वह ईंधन है, जो अमेरिकी शेयर बाजारों को ऊंचा रखता है। जियांग ने स्पष्ट कहा था कि यह पूरा खेल एक वित्तीय बुलबुले पर टिका है, जिसे वे “पोंजी स्कीम” कहते हैं ।
“अमेरिकी अर्थव्यवस्था एक पोंजी स्कीम है। यह GCC (खाड़ी सहयोग परिषद) देशों के AI और टेक स्टॉक्स में निवेश पर निर्भर है।”
यह बयान उस वक्त और भी प्रासंगिक हो जाता है, जब मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ने से तेल की आपूर्ति ठप होने लगी है और खाड़ी देशों की निवेश क्षमता पर खतरा मंडराने लगा है। जियांग ने यह भी भविष्यवाणी की थी कि ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता संघर्ष इसी बुलबुले को फोड़ सकता है ।
पेट्रोडॉलर सिस्टम: 50 साल पुराना ‘इंजन’ चरमराया
पिछले 50 सालों से दुनिया पेट्रोडॉलर सिस्टम पर चल रही है। 1974 में अमेरिका और सऊदी अरब के बीच एक गुप्त समझौता हुआ था: सऊदी अरब तेल सिर्फ डॉलर में बेचेगा और बदले में अमेरिका उसे सुरक्षा देगा । इसके बाद ओपेक के दूसरे देश भी इसी रास्ते पर चल पड़े।
इस सिस्टम का सबसे बड़ा फायदा यह था कि दुनिया के हर उस देश को, जिसे तेल खरीदना था, पहले डॉलर जमा करने पड़ते थे और फिर वे डॉलर अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स (सरकारी कर्ज) में निवेश हो जाते थे। यही वह “सीक्रेट इंजन” था, जिसने अमेरिकी कर्ज की मांग को बनाए रखा और अमेरिका को सस्ता कर्ज लेने की सुविधा दी।
यह इंजन अब धड़-धड़ कर रहा है:
- सऊदी अरब से तेल आयात शून्य: जुलाई 2026 में, अमेरिका ने सऊदी अरब से एक भी बैरल तेल का आयात नहीं किया। पिछले 40 सालों में ऐसा पहली बार हुआ है! । हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में बंदिश और हूथी विद्रोहियों के हमलों ने सऊदी तेल के रास्ते बंद कर दिए हैं ।
- वैकल्पिक मुद्राओं की ओर रुझान: 2024 में अमेरिका-सऊदी समझौते की अवधि समाप्त होने के बाद सऊदी अरब ने डॉलर के अलावा दूसरी मुद्राओं (युआन, रुपया, येन) में तेल का व्यापार करने की संभावना जता दी है । ईरान और रूस पहले से ही डॉलर से बचने की कोशिश कर रहे हैं ।
- ब्रिक्स और डी-डॉलराइजेशन: ब्रिक्स (BRICS) देशों का अपना भुगतान सिस्टम (BRICS Pay) तेजी से आगे बढ़ रहा है। रूस-चीन का 90% से ज्यादा व्यापार अब अपनी-अपनी मुद्राओं में हो रहा है ।
- डॉलर की हिस्सेदारी में गिरावट: वैश्विक रिजर्व करेंसी में डॉलर की हिस्सेदारी, जो 1999 में 71% थी, अब घटकर मात्र 57% रह गई है ।
जापान, चीन, ब्रिटेन सब बेच रहे हैं अमेरिकी कर्ज
प्रोफेसर जियांग ने यह भी कहा था कि चीन जैसा बड़ा कर्जदार अमेरिकी ट्रेजरी बेचना शुरू कर सकता है, जिससे अमेरिकी बाजार में हड़कंप मच जाएगा । यह भविष्यवाणी भी सच होती दिख रही है।
अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, जून 2026 में विदेशी निवेशकों ने कुल मिलाकर 721 मिलियन डॉलर के अमेरिकी बॉन्ड्स बेचे।
- जापान (अमेरिका का सबसे बड़ा कर्जदार) ने अकेले जून में 264 अरब डॉलर के बॉन्ड्स बेचे । इसकी वजह येन को गिरने से बचाना है।
- चीन ने 259 अरब डॉलर के बॉन्ड्स बेचकर अपनी होल्डिंग्स को सितंबर 2008 (लीमैन ब्रदर्स संकट) के बाद के सबसे निचले स्तर पर पहुंचा दिया । यह चीन की लंबी अवधि की रणनीति है, जो अपने रिजर्व को डॉलर से हटाकर दूसरी संपत्तियों में लगा रहा है।
- ब्रिटेन ने 89 अरब डॉलर के बॉन्ड्स बेचे, जो दुनिया भर के हेज फंड्स और बड़े निवेशकों के रुख को दर्शाता है ।
स्कॉट बेसेंट की ‘जबरन खरीदारी’: मजबूरी या रणनीति?
जब विदेशी खरीदार पीछे हट रहे हैं, तो अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट (Scott Bessent) ने एक हैरान करने वाला कदम उठाया। 19 अगस्त 2026 को अमेरिकी ट्रेजरी ने घोषणा की कि वह लॉन्ग-टर्म बॉन्ड्स (10 से 30 साल वाले) की खरीदारी (Buyback) को दोगुना करेगा । यानी, अमेरिकी सरकार खुद अपने ही कर्ज को खरीद रही है, क्योंकि दूसरे देश उसे नहीं खरीदना चाहते। बेसेंट ने CNBC को बताया कि यह खरीदारी 4 अरब डॉलर प्रति इश्यू से भी ज्यादा हो सकती है ।
इस कदम को बाजार में “बुलेट होल पर पट्टी” (Band-aid on a bullet hole) कहा जा रहा है। Evercore ISI के विश्लेषक कृष्ण गुहा ने इसे “कमजोर ऑपरेशन ट्विस्ट” करार दिया, जिसका कोई स्थायी असर नहीं होगा । इस कदम का बाजार पर अल्पकालिक असर भी नहीं हुआ—30-साल के बॉन्ड की पैदावार (यील्ड) बढ़कर 5.31% तक पहुंच गई, जो 19 साल का उच्चतम स्तर है ।

अमेरिकी कर्ज 40 ट्रिलियन डॉलर के पार!
इन सबके बीच, अमेरिकी कर्ज 40 ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े को पार कर गया है । यह अमेरिका के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) से 10 ट्रिलियन डॉलर ज्यादा है। हर अमेरिकी नागरिक पर करीब 11.6 लाख डॉलर का कर्ज है ।
भारत पर क्या असर?
यह संकट भारत को भी प्रभावित करेगा:
- तेल की कीमतें: हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में बंदिश के कारण तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गई हैं । भारत, जो अपनी 80% से ज्यादा तेल जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, को महंगाई और चालू खाता घाटे का सामना करना पड़ेगा।
- रुपये का अवसर: पेट्रोडॉलर सिस्टम कमजोर होने से भारत को रुपये में तेल का व्यापार करने का मौका मिल सकता है। सऊदी अरब पहले से ही रुपये में भुगतान के लिए तैयार है ।
- वैश्विक मंदी का खतरा: अगर अमेरिकी अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ती है, तो इससे वैश्विक मांग घटेगी और भारत के निर्यात पर बुरा असर पड़ेगा।
निष्कर्ष: क्या ‘सपना’ टूट रहा है?
प्रोफेसर जियांग की भविष्यवाणी सिर्फ एक सिद्धांत नहीं, बल्कि हकीकत बनती दिख रही है। जब दुनिया को तेल खरीदने के लिए उतने डॉलर की जरूरत नहीं रहेगी, और जब बड़े देश अमेरिकी कर्ज खरीदना बंद कर देंगे, तो अमेरिका के लिए सस्ता कर्ज लेना मुश्किल हो जाएगा।
यह कोई साजिश नहीं है। यह सिर्फ अर्थशास्त्र और गणित का खेल है, जो अब अपनी लागत वसूल कर रहा है। अमेरिकी खजाना सचिव स्कॉट बेसेंट की मजबूरन की गई खरीदारी इस बात का सबूत है कि पुराना सिस्टम टूट रहा है । अब सवाल यह नहीं है कि क्या बदलाव होगा, बल्कि यह है कि यह बदलाव कितनी तेजी से होगा और इसका खामियाजा किसे भुगतना पड़ेगा।
