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कोलकाता पुलिस की सफेद वर्दी: क्या यह सिर्फ मौसम की वजह है या ‘मेंटल कॉलोनाइजेशन’ का प्रतीक?

August 30, 2026 (Last updated: May 21, 2026) 1 minute read
Kolkata street with traffic officer

भारत में पुलिस की पहचान आमतौर पर खाकी वर्दी से होती है। लेकिन कोलकाता पुलिस आज भी सफेद वर्दी पहनती है। यह सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है कि आखिर कोलकाता पुलिस की वर्दी बाकी राज्यों से अलग क्यों है? और क्या इसका संबंध आज भी औपनिवेशिक मानसिकता यानी “मेंटल कॉलोनाइजेशन” से है?

सफेद वर्दी की शुरुआत कैसे हुई?
कोलकाता पुलिस की स्थापना ब्रिटिश शासन के दौरान 1845 में हुई थी। उस समय ब्रिटिश प्रशासन ने शहर की पुलिस के लिए सफेद वर्दी चुनी। इतिहासकारों और कई रिपोर्ट्स के अनुसार इसके पीछे दो बड़े कारण बताए जाते हैं — पहला, ब्रिटिश प्रशासन की पहचान और दूसरा, कोलकाता का गर्म और बेहद आर्द्र मौसम।

विशेषज्ञों का मानना है कि सफेद रंग गर्मी को कम अवशोषित करता है और धूप को परावर्तित करता है। चूंकि कोलकाता समुद्र के करीब स्थित है और वहां नमी काफी अधिक रहती है, इसलिए सफेद कपड़े पुलिसकर्मियों के लिए अपेक्षाकृत अधिक आरामदायक माने गए।

फिर बाकी भारत ने खाकी क्यों अपनाई?
ब्रिटिश काल में शुरुआत में कई जगहों पर पुलिस और सैन्य बल हल्के रंग की वर्दी पहनते थे। लेकिन बाद में खाकी रंग अपनाया गया क्योंकि यह धूल और गंदगी को कम दिखाता था और फील्ड ड्यूटी के लिए ज्यादा व्यावहारिक माना गया। 1847 में ब्रिटिश अधिकारी सर हैरी लम्सडेन ने खाकी को आधिकारिक रूप से बढ़ावा दिया।

इसके बावजूद कोलकाता पुलिस ने अपनी सफेद वर्दी बनाए रखी। समय के साथ यह शहर की एक अलग पहचान बन गई।

क्या यह “मेंटल कॉलोनाइजेशन” है?
सोशल मीडिया और ऑनलाइन चर्चाओं में कई लोग इसे ब्रिटिश विरासत से जोड़ते हुए “मेंटल कॉलोनाइजेशन” का उदाहरण बताते हैं। उनका तर्क है कि आजादी के 75 साल बाद भी कई संस्थाएं ब्रिटिश दौर की परंपराओं और प्रतीकों को ढो रही हैं।

हालांकि, इतिहास और प्रशासनिक दृष्टि से देखें तो केवल किसी ब्रिटिश-कालीन परंपरा का जारी रहना अपने आप में “मानसिक गुलामी” साबित नहीं करता। भारत की न्याय व्यवस्था, संसद प्रणाली, रेलवे नेटवर्क और कई प्रशासनिक ढांचे भी औपनिवेशिक दौर से आए, लेकिन उन्हें समय के साथ भारतीय जरूरतों के अनुसार ढाला गया।

कोलकाता पुलिस की सफेद वर्दी को लेकर भी यही तर्क दिया जाता है कि अब यह केवल ब्रिटिश पहचान नहीं, बल्कि शहर की सांस्कृतिक और प्रशासनिक पहचान बन चुकी है। कई लोग इसे व्यावहारिक और विशिष्ट मानते हैं।

क्या भविष्य में वर्दी बदल सकती है?
अतीत में ऐसी चर्चाएं हुई थीं कि कोलकाता पुलिस की ब्रिटिश-युग की कई परंपराओं में बदलाव किया जाए, लेकिन सफेद वर्दी आज भी जारी है। दिलचस्प बात यह है कि पश्चिम बंगाल के कुछ अन्य पुलिस कमिश्नरेट्स में भी बाद में सफेद वर्दी अपनाई गई।

कोलकाता पुलिस की सफेद वर्दी का संबंध ब्रिटिश इतिहास से जरूर है, लेकिन इसे केवल “मेंटल कॉलोनाइजेशन” कहना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। इसके पीछे मौसम, प्रशासनिक परंपरा और शहर की अलग पहचान जैसे व्यावहारिक कारण भी मौजूद हैं। आज यह वर्दी कोलकाता की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन चुकी है — ठीक वैसे ही जैसे शहर की ट्राम, पीली टैक्सी और औपनिवेशिक वास्तुकला।

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