विदेशी फंडिंग के माध्यम से देशों को अस्थिर करने की प्रथा नई नहीं है। यह शीत युद्ध काल से चली आ रही एक ऐसी रणनीति है, जिसमें सैन्य बल के बजाय आर्थिक और राजनीतिक हथियारों का इस्तेमाल किया जाता है। भारत में FCRA 2.0 विधेयक को लेकर जो विवाद है, वह इसी वैश्विक परिदृश्य का एक हिस्सा है, जहां देश अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए विदेशी फंडिंग पर सख्त नियंत्रण लागू कर रहे हैं।
विदेशी फंडिंग के माध्यम से अस्थिरता फैलाने का तंत्र
1. “डेमोक्रेसी प्रमोशन” के नाम पर गुप्त संचालन
अमेरिकी नेशनल एंडाउमेंट फॉर डेमोक्रेसी (NED) इस रणनीति का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। 1983 में स्थापित इस संस्था को सीधे तौर पर अमेरिकी कांग्रेस से वित्त पोषण मिलता है—वित्त वर्ष 2026 के लिए $315 मिलियन का बजट स्वीकृत किया गया है।
NED के सह-संस्थापक एलन वेनस्टीन ने स्वीकार किया था: “हम आज जो कुछ भी करते हैं, वह 25 साल पहले CIA गुप्त रूप से करती थी।” यानी, यह संस्था CIA के उन्हीं कार्यों को अब खुले तौर पर अंजाम दे रही है, लेकिन “नागरिक समाज” और “लोकतंत्र” के नाम पर।
2. रंग क्रांतियाँ (Color Revolutions) का खाका
USAID और NED ने कई देशों में “रंग क्रांतियों” को वित्त पोषित किया है। डॉ. मार्को मार्सिली के अनुसार, USAID ने 2006 तक इन अभियानों में अपनी भूमिका स्वीकार कर ली थी:
देश घटना अमेरिकी सहायता
जॉर्जिया गुलाब क्रांति (2003) $103M (2002), $141.16M (2003)
यूक्रेन नारंगी क्रांति (2004) $188.5M (2003), $143.47M (2004)
किर्गिस्तान ट्यूलिप क्रांति (2005) $56.6M (2003), $50.8M (2004)
USAID ने खुले तौर पर स्वीकार किया कि जॉर्जिया ने सर्बिया (2000) के रणनीति को “उधार” लिया, और बाद में यूक्रेन ने जॉर्जिया के तरीकों की नकल की।
3. मीडिया और थिंक टैंक्स के माध्यम से प्रभाव
विदेशी फंडिंग अक्सर मीडिया संगठनों और थिंक टैंक्स के माध्यम से चलाई जाती है जो “स्वतंत्र” दिखते हैं। फ्रांसीसी प्रकाशन Mediapart ने खुलासा किया कि OCCRP (ऑर्गनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट) को अमेरिकी डीप स्टेट से $47 मिलियन तक का फंडिंग मिला था। ये संगठन उन सरकारों के खिलाफ “जाँच रिपोर्ट” प्रकाशित करते हैं जिन्हें अमेरिका विरोधी माना जाता है।
4. हिंसक विरोध प्रदर्शनों का वित्तपोषण
विदेशी फंडिंग का उपयोग अक्सर सड़कों पर उतरने वाले विरोध प्रदर्शनों को वित्तपोषित करने के लिए किया जाता है। भारत के संदर्भ में, 2018 के एंटी-स्टरलाइट विरोध, 2020 के दिल्ली दंगे और 2020-21 के किसान आंदोलन में विदेशी NGO की भूमिका की जाँच एजेंसियों ने पड़ताल की है।
NED अपने फंडिंग मॉडल के माध्यम से चुनावों, नेतृत्व परिवर्तनों और राष्ट्रीय संकट के क्षणों में हस्तक्षेप करता है ताकि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को बाधित किया जा सके।
भारत: विदेशी हस्तक्षेप का प्रमुख निशाना
खुफिया एजेंसियों के निष्कर्ष
भारतीय खुफिया एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि नेपाल की कमजोर वित्तीय नियमन प्रणाली के माध्यम से भारत में अवैध फंडिंग पहुँचाई जा सकती है। FATF ने नेपाल को ग्रे लिस्ट में डाला है, जिससे चिंता बढ़ गई है कि हवाला नेटवर्क भारत में अस्थिरता फैलाने के लिए धन पहुँचा सकते हैं।
FCRA सख्ती के कारण
भारत सरकार ने 2016 से विदेशी फंडिंग पर सख्ती बरतनी शुरू की। 2022 तक 6,003 NGOs का FCRA पंजीकरण रद्द कर दिया गया। इसका कारण यह था कि कई NGO ने:
- अपने विदेशी फंडिंग स्रोतों का खुलासा नहीं किया
- फंड का दुरुपयोग किया
- विदेशी हस्तक्षेप के लिए माध्यम बने
भारत में NGO नेटवर्क का मामला
एक जाँच से पता चला कि सोरोस के Open Society Foundation ने CHRI (Commonwealth Human Rights Initiative) को 12 वर्षों में ₹50 करोड़ से अधिक दान दिया था। 2016 में जब सरकार ने सोरोस फाउंडेशन को “पूर्व अनुमति” सूची में डाला, तब फंडिंग का रास्ता बदल दिया गया—पैसा CHRI-UK नामक एक मध्यस्थ संगठन के माध्यम से भारत पहुँचाया जाने लगा।
इसी तरह, Centre for Policy Research (CPR) को फोर्ड फाउंडेशन से ₹11.63 करोड़, Omidyar Network से ₹1.6 करोड़ और Namati से ₹2 करोड़ की फंडिंग मिली।
FCRA 2.0: अस्थिरता रोकने का भारत का कदम
FCRA 2.0 विधेयक इन्हीं खतरों को ध्यान में रखकर बनाया गया है:
- डिज़ाइनेटेड अथॉरिटी: अगर किसी NGO का पंजीकरण रद्द होता है, तो सरकार उसकी विदेशी फंडिंग और उससे बनी संपत्तियों का प्रबंधन अपने हाथ में ले सकती है—ताकि वह फंड अस्थिरता फैलाने के काम न आए।
- न्यूनतम फंडिंग सीमा: जिन संगठनों को दो वर्षों में ₹10 लाख से कम विदेशी फंड मिला है, वे नवीनीकरण के योग्य नहीं होंगे—इससे छोटे संगठनों का उपयोग फ्रंट के रूप में नहीं किया जा सकेगा।
- प्रमुख कार्यकर्ताओं की देयता: अब NGO के निदेशक, ट्रस्टी और पदाधिकारी व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होंगे—जिससे विदेशी एजेंटों के लिए जिम्मेदारी से बचना मुश्किल होगा।
वैश्विक सबक: चीन और अन्य देशों का दृष्टिकोण
चीन ने विदेशी NGO कानून बनाकर NED जैसी संस्थाओं को अपने देश में काम करने से रोक दिया है। चीनी विदेश मंत्रालय ने NED को “अमेरिकी सरकार के सफेद दस्ताने” करार दिया है, जो “अन्य देशों की राज्य सत्ता को कमजोर करने, उनके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने” का काम करता है।
विदेशी फंडिंग के माध्यम से देशों को अस्थिर करना एक सुस्थापित रणनीति है, जिसे “डेमोक्रेसी प्रमोशन” और “मानवाधिकार” के नाम पर छिपाया जाता है। FCRA 2.0 भारत का उसी खतरे के खिलाफ एक आत्मरक्षा उपाय है—जब विदेशी ताकतें आर्थिक हथियारों का उपयोग कर किसी देश की संप्रभुता को चुनौती देती हैं, तो उस देश को अपने कानूनी ढाँचे को मजबूत करना ही पड़ता है।
अमेरिकी कांग्रेसमैन राइली मूर की आपत्ति को इसी संदर्भ में देखना चाहिए: जब भारत अपनी सुरक्षा के लिए कदम उठाता है, तो विदेशी हितधारक उसे “ईसाइयों पर हमला” या “नागरिक समाज का दमन” कहते हैं। लेकिन जैसा कि चीन, रूस और अन्य देशों ने दिखाया है, संप्रभुता की रक्षा के लिए विदेशी फंडिंग पर नियंत्रण आवश्यक है—भले ही इसका विरोध कितना भी तीव्र क्यों न हो।
