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चीन का बड़ा आर्थिक दांव: अमेरिकी ट्रेजरी से दूरी, सोने पर बढ़ता भरोसा—क्या तेज हो रहा है डी-डॉलराइजेशन?

अगस्त 23, 2026 (अंतिम अद्यतन: अगस्त 9, 2026) 2 मिनट पढ़ें
From Treasury Decline to Golden Rise

चीन अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड से अपनी निर्भरता लगातार कम कर रहा है और दूसरी तरफ सोने के भंडार को बढ़ा रहा है। यह बदलाव ऐसे समय में हो रहा है जब दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाएं अपने विदेशी मुद्रा भंडार में विविधता लाने और अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रही हैं।

सोशल मीडिया पर वायरल दावों में कहा जा रहा है कि चीन ने करीब $657 अरब के U.S. Treasuries बेच दिए हैं और अब उसके पास लगभग $651.1 अरब ही बचे हैं, जो 2008 के बाद सबसे निचले स्तरों में है।

लेकिन तस्वीर बड़ी स्पष्ट है—चीन पिछले कई वर्षों से अमेरिकी सरकारी बॉन्ड में अपनी हिस्सेदारी घटा रहा है।

चीन की Treasury holdings लगातार क्यों घट रही हैं?
चीन लंबे समय तक अमेरिकी Treasury securities का सबसे बड़ा विदेशी धारक रहा है। एक समय उसकी holdings $1 ट्रिलियन से काफी ऊपर थीं।

अब तस्वीर बदल रही है।

अप्रैल 2026 के आंकड़ों के अनुसार चीन की U.S. Treasury holdings घटकर करीब $651.1 अरब रह गई थीं। Reuters के मुताबिक यह सितंबर 2008 के बाद का सबसे निचला स्तर था। इसके विपरीत, जापान करीब $1.21 ट्रिलियन के साथ सबसे बड़ा विदेशी holder बना हुआ था।

इसका अर्थ यह नहीं है कि चीन अचानक अमेरिकी बाजार से बाहर निकल रहा है।

बल्कि इसे लंबे समय से चल रही reserve diversification strategy के हिस्से के रूप में देखा जा सकता है।

चीन के सामने एक बड़ी समस्या यह है कि उसके पास दुनिया के सबसे बड़े विदेशी मुद्रा भंडारों में से एक है। ऐसे में वह अपने पूरे reserve portfolio को एक ही देश या मुद्रा पर निर्भर नहीं रखना चाहता।

दूसरी तरफ सोना लगातार बढ़ रहा है
यहीं कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा सामने आता है।

चीन का केंद्रीय बैंक—People’s Bank of China यानी PBoC—लगातार सोना खरीद रहा है।

जून 2026 में चीन ने अपने आधिकारिक gold reserves में करीब 480,000 fine troy ounces, यानी लगभग 15 टन सोना जोड़ा। इसके साथ चीन की gold-buying streak लगातार 20वें महीने तक पहुंच गई। जून के अंत तक चीन के आधिकारिक सोने के भंडार करीब 75.44 million ounces हो गए थे।

जुलाई में भी चीन ने सोने की खरीद जारी रखी और Reuters के अनुसार PBoC की gold reserves में वृद्धि लगातार पांचवें महीने हुई। जुलाई की बढ़ोतरी अक्टूबर 2023 के बाद सबसे बड़ी मासिक वृद्धि रही।

यानी यह केवल एक-दो महीने की रणनीति नहीं है।

यह कई महीनों से चल रही लगातार reserve diversification है।

क्या चीन डॉलर छोड़ रहा है?
यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल है—क्या चीन अमेरिकी डॉलर को पूरी तरह छोड़ रहा है?

नहीं। कम से कम उपलब्ध आंकड़े ऐसा नहीं दिखाते।

चीन के पास अभी भी सैकड़ों अरब डॉलर की U.S. Treasury securities हैं और चीन का अंतरराष्ट्रीय व्यापार भी डॉलर से पूरी तरह अलग नहीं हुआ है।

लेकिन रणनीति बदलती दिखाई दे रही है।

पहले जहां विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी Treasury securities की भूमिका बहुत बड़ी थी, वहीं अब चीन:

U.S. Treasuries ↓
Gold ↑
Yuan-based financial infrastructure ↑
Alternative payment/trading systems ↑

जैसे कई रास्तों पर आगे बढ़ रहा है।

यही प्रक्रिया व्यापक अर्थ में डी-डॉलराइजेशन कहलाती है।

सोना चीन के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
सोने को किसी दूसरे देश की देनदारी नहीं माना जाता।

U.S. Treasury एक अमेरिकी सरकारी दायित्व है। इसके विपरीत, भौतिक सोना किसी विदेशी सरकार या केंद्रीय बैंक के भुगतान वादे पर निर्भर नहीं करता।

इसी कारण geopolitical tensions के दौर में केंद्रीय बैंक सोने को reserve diversification और risk hedge के रूप में इस्तेमाल करते हैं।

World Gold Council के आंकड़े बताते हैं कि 2025 में वैश्विक केंद्रीय बैंकों ने कुल 863 टन सोना खरीदा। यह पिछले तीन वर्षों के 1,000 टन से अधिक के स्तर से कम था, लेकिन फिर भी ऐतिहासिक रूप से मजबूत खरीद बनी रही।

चीन इस व्यापक trend का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

चीन सिर्फ सोना नहीं खरीद रहा, गोल्ड सिस्टम भी मजबूत कर रहा है
चीन की रणनीति केवल अपने केंद्रीय बैंक के vaults में सोना जमा करने तक सीमित नहीं दिखाई देती।

Hong Kong को एशिया के बड़े gold trading hub के रूप में विकसित करने की कोशिश भी तेज हो रही है।

Reuters के अनुसार चीन Hong Kong को वैश्विक gold trading का अधिक महत्वपूर्ण केंद्र बनाने की दिशा में कदम उठा रहा है। जुलाई 2026 में Hong Kong और Shanghai Gold Exchange के बीच physical gold delivery system भी शुरू किया गया।

इसका एक रणनीतिक उद्देश्य वैश्विक gold price discovery में London और New York के प्रभुत्व को चुनौती देना और yuan-denominated gold markets की भूमिका बढ़ाना है।

यानी चीन एक साथ दो मोर्चों पर काम करता दिखाई दे रहा है:

Dollar-based financial system → धीरे-धीरे diversification

और

Gold + Yuan-based infrastructure → धीरे-धीरे expansion

क्या यह अमेरिका के लिए खतरे की घंटी है?
चीन का Treasury holdings कम करना अपने आप में अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए कोई तत्काल संकट नहीं है।

अमेरिकी Treasury market इतना विशाल है कि किसी एक विदेशी holder की बिक्री से पूरा बाजार खत्म नहीं हो जाता।

लेकिन समस्या तब बढ़ सकती है जब कई बड़े देश एक साथ अमेरिकी सरकारी बॉन्ड की मांग कम करना शुरू कर दें।

ऐसी स्थिति में अमेरिकी सरकार को अपने विशाल budget deficit को finance करने के लिए निवेशकों को अधिक आकर्षक yields देनी पड़ सकती हैं।

इसका असर:

  • U.S. borrowing costs पर
  • Treasury yields पर
  • mortgage rates पर
  • corporate borrowing पर
  • global bond markets पर

पड़ सकता है।

Reuters ने हाल में भी Treasury market में बढ़ती अस्थिरता और जापान जैसे बड़े holders की भूमिका को लेकर चिंता दर्ज की है।

लेकिन एक और पहलू भी समझना जरूरी है
चीन अगर Treasury बेचता है तो इसका मतलब यह नहीं कि डॉलर उसके पास से गायब हो जाता है।

Treasury बेचने के बाद प्राप्त डॉलर को चीन किसी अन्य dollar asset में रख सकता है, किसी दूसरे देश की currency में बदल सकता है या gold जैसी reserve asset खरीद सकता है।

इसलिए “Treasury selling = dollar selling” हमेशा एक ही बात नहीं होती।

यही कारण है कि चीन की गतिविधियों को समझने के लिए केवल Treasury holdings नहीं, बल्कि उसके पूरे reserve portfolio को देखना जरूरी है।

क्या डी-डॉलराइजेशन तेज हो रहा है?
यहां तस्वीर काफी दिलचस्प है।

दुनिया अभी भी डॉलर पर भारी निर्भर है। वैश्विक व्यापार, बैंकिंग, वित्तीय बाजार और foreign exchange transactions में डॉलर की भूमिका बहुत बड़ी है।

लेकिन दूसरी तरफ कई देश:

  • gold reserves बढ़ा रहे हैं,
  • bilateral trade में स्थानीय मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं,
  • yuan-based settlement infrastructure विकसित कर रहे हैं,
  • alternative payment systems पर काम कर रहे हैं,
  • और U.S. financial sanctions से जुड़े जोखिमों को कम करना चाहते हैं।

इसलिए डी-डॉलराइजेशन का अर्थ यह नहीं है कि “कल से डॉलर खत्म हो जाएगा।”

इसका अर्थ अधिक सटीक रूप से यह है कि दुनिया धीरे-धीरे एकल मुद्रा पर निर्भर व्यवस्था से अधिक diversified reserve system की ओर बढ़ सकती है।

चीन की रणनीति का असली लक्ष्य क्या हो सकता है?
चीन के लिए सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य शायद डॉलर को अचानक गिराना नहीं है।

बल्कि वह अपने लिए strategic financial autonomy तैयार करना चाहता है।

अगर भविष्य में अमेरिका और चीन के बीच तनाव बढ़ता है, sanctions लगाए जाते हैं या global financial restrictions बढ़ती हैं, तो चीन के पास ज्यादा gold, yuan infrastructure और diversified reserves होने से उसकी vulnerability कम हो सकती है।

इसीलिए चीन का संदेश शायद यह नहीं है कि:

“हम डॉलर छोड़ रहे हैं।”

बल्कि संदेश ज्यादा करीब हो सकता है:

“हम डॉलर पर अपनी निर्भरता कम कर रहे हैं।”

और इन दोनों बातों में बहुत बड़ा अंतर है।

दुनिया के लिए इसका क्या मतलब है?
अगर चीन जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था लंबे समय तक Treasury holdings घटाती रहती है और gold reserves बढ़ाती रहती है, तो दूसरे केंद्रीय बैंक भी अपने reserve strategies पर पुनर्विचार कर सकते हैं।

इसका परिणाम एक ऐसी वैश्विक वित्तीय व्यवस्था के रूप में सामने आ सकता है जिसमें:

डॉलर + यूरो + युआन + गोल्ड + अन्य reserve assets

सभी की भूमिका होगी।

यानी भविष्य की वैश्विक वित्तीय व्यवस्था शायद पूरी तरह de-dollarized नहीं होगी, लेकिन पहले की तुलना में अधिक multi-polar हो सकती है।

निष्कर्ष: चीन सिस्टम से बाहर नहीं, सिस्टम को बदलने की कोशिश में?
“China is exiting the system” जैसी सोशल मीडिया हेडलाइन आकर्षक जरूर है, लेकिन वास्तविक तस्वीर इससे अधिक जटिल है।

चीन अभी भी अमेरिकी डॉलर और Treasury market से जुड़ा हुआ है। लेकिन उसके reserve portfolio में एक स्पष्ट बदलाव दिखाई दे रहा है—U.S. Treasury holdings में दीर्घकालिक कमी और gold accumulation में मजबूती।

और जब इसी के साथ yuan-based financial infrastructure तथा Hong Kong के gold market को मजबूत करने की कोशिशों को देखा जाता है, तो यह केवल निवेश का फैसला नहीं बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक रणनीति जैसा दिखाई देता है।

सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि “क्या चीन कल डॉलर छोड़ देगा?”

सवाल यह है:

क्या चीन और अन्य देश मिलकर ऐसी दुनिया बना रहे हैं जहां डॉलर अब अकेली प्रमुख reserve asset नहीं रहेगा?

अगर यह बदलाव धीरे-धीरे जारी रहता है, तो आने वाले वर्षों में डी-डॉलराइजेशन दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक कहानियों में से एक बन सकता है।

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