नई दिल्ली: भारत सरकार के प्रस्तावित विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026, जिसे आमतौर पर FCRA 2.0 के नाम से जाना जाता है, ने एक बड़ी राजनीतिक और कूटनीतिक बहस छेड़ दी है। इस विवाद के केंद्र में दो विरोधी धारणाएँ हैं: एक तरफ भारत सरकार की अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा को सख्त नियमों के माध्यम से सुरक्षित करने की मंशा है, तो दूसरी तरफ अमेरिकी कांग्रेसमैन राइली मूर जैसे अंतरराष्ट्रीय आवाज़ों का आरोप है कि यह विधेयक “ईसाई समुदाय पर सीधा हमला” है। इस लेख में हम इस विवाद की पृष्ठभूमि, नए विधेयक की विशेषताओं और भारत में विदेशी फंडिंग पर सख्ती बरतने के कारणों की विस्तार से समीक्षा करेंगे।
क्या है FCRA 2.0 विधेयक?
विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026, मौजूदा FCRA कानून में व्यापक बदलाव लाने का प्रस्ताव है, जो भारत में गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), धार्मिक ट्रस्टों और शैक्षणिक संस्थानों द्वारा विदेशी चंदा लेने और उसके उपयोग को नियंत्रित करता है।
विधेयक के मुख्य प्रावधान
विधेयक का सबसे विवादास्पद पहलू “अधिकृत प्राधिकरण” (Designated Authority) का गठन है, जिसे केंद्र सरकार नियुक्त करेगी। यह प्राधिकरण उन संगठनों के विदेशी चंदे और उससे बनी संपत्तियों का प्रबंधन अपने हाथ में ले सकेगा, यदि उनका FCRA पंजीकरण रद्द, समर्पित या समाप्त हो जाता है। विधेयक के अनुसार, यदि संपत्ति में पूजा स्थल शामिल है, तो प्राधिकरण को उसके धार्मिक चरित्र को संरक्षित रखना होगा।
अन्य महत्वपूर्ण बदलावों में शामिल हैं:
उपयोग की समय-सीमा: विधेयक पूर्व अनुमति मार्ग के तहत विदेशी चंदे की प्राप्ति और उपयोग के लिए विशिष्ट समय-सीमा निर्धारित करता है।
संपत्तियों पर रोक: यह पंजीकरण निलंबन के दौरान विदेशी चंदे से बनी संपत्तियों को सरकार की अनुमति के बिना अलग या बोझिल करने पर रोक लगाता है।
स्वत: समाप्ति: यदि नवीकरण के लिए आवेदन नहीं किया जाता है या नवीकरण अस्वीकार कर दिया जाता है तो पंजीकरण की स्वत: समाप्ति का प्रावधान है।
“प्रमुख कार्यकर्ताओं” की देयता: विधेयक दायित्व का विस्तार “प्रमुख कार्यकर्ताओं” (निदेशक, ट्रस्टी, पदाधिकारी) तक करता है, जिससे वे संगठनात्मक अपराधों के लिए व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होंगे।
दंड में संशोधन: अनुपालन न करने के दायरे को बढ़ाते हुए, विधेयक अधिकतम कारावास अवधि को पाँच वर्ष से घटाकर एक वर्ष कर देता है।
विवाद की जड़: अमेरिकी कांग्रेसमैन के आरोप
5 अगस्त, 2026 को अमेरिकी कांग्रेसमैन राइली मूर (रिपब्लिकन पार्टी, वेस्ट वर्जीनिया) ने सोशल मीडिया पर इस विधेयक के खिलाफ जोरदार आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि यह विधेयक भारत सरकार को चर्चों और धार्मिक चैरिटी संगठनों पर कब्ज़ा करने की अनुमति देगा, जिसे उन्होंने ईसाई समुदाय पर “सीधा हमला” करार दिया।
मूर ने ईसाई धर्म के भारत में लंबे इतिहास का जिक्र करते हुए कहा कि सेंट थॉमस द एपोस्टल के मालाबार तट पर आगमन के बाद से ईसाई भारत में हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि विधेयक अपने वर्तमान स्वरूप में पारित होता है, तो यह “भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों में बड़ी चिंता का विषय” बन जाएगा। इस बयान ने एक आंतरिक नियामक मामले को दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव से जोड़ दिया।
विदेशी हस्तक्षेप की पृष्ठभूमि: टिमोथी इनिशिएटिव मामला
भारत सरकार इस विधेयक को राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक बताती है। इस दृष्टिकोण को हाल की उच्च-स्तरीय जाँचों ने बल दिया है, जिनमें विदेशी फंडिंग नेटवर्क भारतीय कानूनों का उल्लंघन करते पाए गए हैं।
प्रवर्तन निदेशालय (ED) एक अमेरिकी इंजील संगठन द टिमोथी इनिशिएटिव (TTI) की जाँच कर रहा है। जाँच में आरोप है कि TTI, जो FCRA के तहत पंजीकृत नहीं है, ने विदेशी डेबिट कार्डों के एक जटिल नेटवर्क के माध्यम से भारत में 92 करोड़ रुपये से अधिक की फंडिंग की। प्रत्यक्ष वायर ट्रांसफर के बजाय, TTI ने कथित तौर पर Truist Bank, USA द्वारा जारी विदेशी डेबिट कार्ड आयात किए और उनका उपयोग पूरे भारत में एटीएम से नकदी निकालने के लिए किया, विशेष रूप से संवेदनशील क्षेत्रों जैसे छत्तीसगढ़ के बस्तर में। जाँचकर्ताओं का दावा है कि 1,000 से अधिक ऐसे डेबिट कार्ड वितरित किए गए।
यह मामला भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय बन गया है। ED ने सुझाव दिया है कि निकाली गई नकदी का उपयोग अवैध धर्मांतरण, कट्टरपंथी गतिविधियों और संभावित रूप से वामपंथी उग्रवाद (LWE) को बढ़ावा देने के लिए किया गया था। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने जाँच को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए कहा कि “गुप्त फंडिंग” राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है और उग्रवाद का वित्तपोषण “वह ऑक्सीजन है जो उग्रवादी आंदोलनों को जीवित रखती है”।
FCRA विवादों का इतिहास और ईसाई संगठन
यह पहली बार नहीं है जब FCRA को लेकर ईसाई संगठनों और विदेशी फंडिंग को लेकर विवाद हुआ हो।
मदर टेरेसा की मिशनरीज ऑफ चैरिटी मामला
दिसंबर 2021 में, भारत सरकार ने मदर टेरेसा की मिशनरीज ऑफ चैरिटी (MoC) के FCRA पंजीकरण को नवीनीकृत करने से इनकार कर दिया था। सरकार ने “प्रतिकूल इनपुट” का हवाला देते हुए यह निर्णय लिया, हालाँकि विवरण सार्वजनिक नहीं किए गए। इस फैसले ने दान के कामों पर असर डाला क्योंकि MoC को विदेशी फंडिंग बंद हो गई।
भारतीय मीडिया रिपोर्टों ने बताया कि MoC पर “भारतीय लड़कियों को ईसाई धर्म में परिवर्तित करने के लिए मजबूर करने” के आरोप थे। गुजरात पुलिस ने MoC द्वारा संचालित “गर्ल्स होम” पर हिंदू लड़कियों को ईसाई धर्म से संबंधित सामग्री पढ़ने और प्रार्थना में शामिल होने के लिए मजबूर करने का आरोप लगाया था। MoC ने इन आरोपों का खंडन किया।
2022 में 6,000 से अधिक NGOs का पंजीकरण रद्द
जनवरी 2022 में, भारत सरकार ने 6,003 NGOs को FCRA नियमों का पालन न करने के कारण पंजीकृत संगठनों की सूची से हटा दिया। इनमें ऑक्सफैम इंडिया और मिशनरीज ऑफ चैरिटी शामिल थे। इन संगठनों को विदेशी फंड प्राप्त करने या उपयोग करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
भारतीय अधिकारियों ने कहा कि 179 संगठनों के नवीनीकरण आवेदन अयोग्य पाए गए, जबकि 5,789 संगठनों ने समय सीमा से पहले आवेदन ही नहीं किया। ऑक्सफैम इंडिया ने विरोध किया कि इस फैसले से उनके बैंक खातों में 6.2 करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी फंडिंग फंस गई।
निष्कर्ष: संप्रभुता और जाँच के बीच टकराव
FCRA 2.0 विधेयक को लेकर विवाद एक मूलभूत तनाव को उजागर करता है। भारत सरकार के लिए, यह विधेयक विदेशी हस्तक्षेप के खिलाफ एक सुरक्षा उपाय है, जो विदेशी फंड को आंतरिक मामलों में हेरफेर करने या अशांति भड़काने से रोकता है। TTI मामला इस बात का उदाहरण है कि कैसे विदेशी संस्थाएँ भारतीय नियमों को दरकिनार कर संवेदनशील क्षेत्रों में धन पहुँचाने का प्रयास कर सकती हैं।
दूसरी तरफ, अमेरिकी कांग्रेसमैन राइली मूर और कई नागरिक समाज समूहों जैसे आलोचकों के लिए, यह विधेयक धार्मिक स्वतंत्रता और गैर-सरकारी संगठनों की स्वायत्तता को खतरे में डालने वाला एक दमनकारी उपकरण है। यह बहस केवल वित्तीय विनियमन के बारे में नहीं है; यह संप्रभुता, पारदर्शिता और भारत के घरेलू परिदृश्य में विदेशी प्रभाव की भूमिका पर एक छद्म युद्ध है। जैसे-जैसे यह विधेयक संसद में आगे बढ़ेगा, यह भारत-अमेरिका संबंधों में एक फ्लैशपॉइंट और भारत के अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा गणना के अनुसार विदेशी योगदान के प्रबंधन के संकल्प की परीक्षा बना रहेगा।
