अमेरिका और ईरान के बीच ऐतिहासिक समझौता
कई महीनों से जारी तनाव और सैन्य टकराव के बाद अमेरिका और ईरान के बीच एक महत्वपूर्ण समझौते पर आधिकारिक मुहर लग गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने 14 बिंदुओं वाले इस समझौते (मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग – MOU) पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके बाद दोनों देशों के बीच युद्धविराम लागू हो गया है।
व्हाइट हाउस ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि समझौते का उद्देश्य क्षेत्रीय स्थिरता बहाल करना, परमाणु विवाद को समाप्त करना और मध्य पूर्व में शांति स्थापित करना है। इस समझौते का सबसे बड़ा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है, क्योंकि इसके तहत रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) को फिर से खोलने का निर्णय लिया गया है।
क्या है इस समझौते की सबसे बड़ी खासियत?
समझौते के तहत अमेरिका, ईरान और उनके सहयोगी देशों ने सभी सैन्य अभियानों को तत्काल और स्थायी रूप से समाप्त करने पर सहमति जताई है। इसमें लेबनान से जुड़े संघर्ष भी शामिल हैं।
दोनों देशों ने एक-दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने तथा आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का वादा किया है।
60 दिनों में अंतिम समझौते की कोशिश
एमओयू के अनुसार अमेरिका और ईरान अगले 60 दिनों के भीतर एक व्यापक और अंतिम समझौते पर बातचीत पूरी करने की कोशिश करेंगे। यदि दोनों पक्ष सहमत होते हैं तो इस समयसीमा को बढ़ाया भी जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह अवधि दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली के लिए महत्वपूर्ण साबित होगी।
अमेरिका हटाएगा नौसैनिक नाकाबंदी
समझौते के तहत अमेरिका ईरान के खिलाफ लागू नौसैनिक नाकाबंदी को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करेगा। अगले 30 दिनों के भीतर ईरानी बंदरगाहों पर लगाए गए प्रतिबंधों और व्यवधानों को हटाने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
इसके साथ ही अमेरिका ने संघर्ष शुरू होने से पहले की स्थिति में अपनी सैन्य मौजूदगी वापस लाने का भी वादा किया है।
फिर खुलेगा होर्मुज़ स्ट्रेट
दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल होर्मुज़ स्ट्रेट को दोबारा खोला जाएगा। युद्ध के दौरान इसके बंद होने से वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हुई थी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज़ उछाल देखा गया था।
समझौते के तहत ईरान सुरक्षित समुद्री आवागमन सुनिश्चित करेगा और जहाज़ों से किसी प्रकार का अतिरिक्त शुल्क नहीं लिया जाएगा।
भारत समेत कई तेल आयातक देशों के लिए यह राहत भरी खबर मानी जा रही है।
ईरान के पुनर्निर्माण के लिए 300 अरब डॉलर का फंड
समझौते में ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर के निवेश कार्यक्रम का प्रस्ताव रखा गया है।
हालांकि अमेरिकी प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका सीधे तौर पर ईरान को कोई आर्थिक सहायता नहीं देगा। इसके बजाय क्षेत्रीय सहयोगी देश और निजी निवेशक परियोजनाओं में निवेश कर सकते हैं।
आर्थिक प्रतिबंधों में मिलेगी राहत
समझौते का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने से जुड़ा है। अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र के कई प्रतिबंधों को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने की योजना बनाई गई है।
हालांकि प्रतिबंधों में राहत इस बात पर निर्भर करेगी कि ईरान समझौते की शर्तों का कितना पालन करता है।
परमाणु हथियार नहीं बनाएगा ईरान
इस समझौते का सबसे अहम बिंदु यह है कि ईरान ने परमाणु हथियार विकसित न करने की प्रतिबद्धता दोहराई है।
साथ ही, ईरान के पास मौजूद उच्च संवर्धित यूरेनियम को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी में कम संवर्धित स्तर पर लाने की प्रक्रिया पर भी सहमति बनी है।
अमेरिकी प्रशासन इसे अपनी बड़ी कूटनीतिक सफलता बता रहा है।
फ्रीज़ की गई संपत्तियां होंगी जारी
समझौते के अनुसार अमेरिका ईरान की फ्रीज़ की गई संपत्तियों और प्रतिबंधित फंड्स को चरणबद्ध तरीके से जारी करेगा।
हालांकि यह प्रक्रिया भी ईरान द्वारा समझौते के पालन से जुड़ी होगी और दोनों देशों के बीच आगे की वार्ताओं में इसका विस्तृत खाका तय किया जाएगा।
मध्य पूर्व की राजनीति पर क्या होगा असर?
विश्लेषकों का मानना है कि यह समझौता केवल अमेरिका और ईरान के संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे मध्य पूर्व की भू-राजनीति को प्रभावित कर सकता है।
यदि समझौता सफलतापूर्वक लागू होता है तो क्षेत्र में सैन्य तनाव कम होगा, वैश्विक ऊर्जा बाजार स्थिर होंगे और कई वर्षों से चले आ रहे परमाणु विवाद का समाधान निकल सकता है।
हालांकि अभी भी कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अंतिम सहमति बनना बाकी है और आने वाले 60 दिन इस समझौते की वास्तविक सफलता तय करेंगे।
अमेरिका और ईरान के बीच हुआ यह समझौता हाल के वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटनाओं में से एक माना जा रहा है। युद्धविराम, होर्मुज़ स्ट्रेट का खुलना, आर्थिक प्रतिबंधों में राहत और परमाणु कार्यक्रम पर नियंत्रण जैसे कदम वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों पर गहरा प्रभाव डाल सकते हैं।
अब दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि दोनों देश आगामी 60 दिनों में अंतिम समझौते तक पहुंच पाते हैं या नहीं।
