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विजय के विधायकों की सीधी चेतावनी: DMK-AIADMK ने मिलकर बनाई सरकार तो TVK के सभी विधायक देंगे इस्तीफा

August 30, 2026 (Last updated: May 7, 2026) 1 minute read
TVK support letter

विजय के विधायकों की सीधी धमकी

तमिलनाडु की राजनीति इस समय अपने सबसे बड़े संवैधानिक और राजनीतिक संकटों में से एक से गुजर रही है। अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन बहुमत के आंकड़े से पीछे रह गई। इसी बीच अब ऐसी चर्चाएं तेज हो गई हैं कि राज्य की दो कट्टर प्रतिद्वंद्वी पार्टियां — द्रविड़ मुनेत्र कड़गम और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम — सत्ता से विजय को दूर रखने के लिए साथ आ सकती हैं।

इन अटकलों के बीच TVK के विधायकों ने बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए साफ संकेत दिया है कि अगर DMK और AIADMK मिलकर सरकार बनाती हैं, तो उनकी पार्टी के सभी विधायक सामूहिक इस्तीफा दे सकते हैं।

तमिलनाडु में क्यों बना राजनीतिक गतिरोध?
2026 तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजों ने राज्य की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया। दशकों से राज्य की राजनीति DMK और AIADMK के इर्द-गिर्द घूमती रही है, लेकिन इस बार विजय की TVK ने बड़ी राजनीतिक सेंध लगाई। चुनाव में TVK 108 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन 234 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए जरूरी 118 सीटों से वह पीछे रह गई।

दूसरी ओर DMK को बड़ा झटका लगा और पार्टी केवल 59 सीटों पर सिमट गई। AIADMK भी उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाई और 47 सीटें ही जीत सकी। कांग्रेस के पांच विधायकों ने TVK को समर्थन देने का संकेत दिया, लेकिन इसके बावजूद विजय बहुमत के आंकड़े तक नहीं पहुंच सके।

इसी वजह से राज्य में त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति बन गई है। राज्यपाल के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि आखिर किसे सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जाए।

विजय ने पेश किया सरकार बनाने का दावा
चुनाव परिणाम आने के बाद विजय ने राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर से मुलाकात कर सरकार बनाने का दावा पेश किया। उन्होंने दावा किया कि उन्हें अन्य दलों और निर्दलीय विधायकों का समर्थन मिल रहा है। हालांकि राज्यपाल ने उनसे 118 विधायकों का स्पष्ट समर्थन पत्र दिखाने को कहा।

रिपोर्ट्स के मुताबिक राज्यपाल अभी तक TVK के दावों से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं। यही कारण है कि सरकार गठन को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है।

तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा धमाका TVK विधायकों की सीधी चेतावनी

DMK और AIADMK के साथ आने की चर्चा क्यों?
तमिलनाडु की राजनीति में DMK और AIADMK दशकों से कट्टर प्रतिद्वंद्वी रही हैं। दोनों दलों के बीच राजनीतिक संघर्ष इतना गहरा रहा है कि इनका साथ आना कभी लगभग असंभव माना जाता था। लेकिन वर्तमान राजनीतिक स्थिति में सत्ता समीकरण तेजी से बदलते दिख रहे हैं।

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि विजय को सत्ता से रोकने के लिए दोनों दल पर्दे के पीछे बातचीत कर सकते हैं। हालांकि DMK ने आधिकारिक तौर पर AIADMK के साथ गठबंधन की संभावना से इनकार किया है।

इसके बावजूद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जारी है कि अगर राज्यपाल विजय को सरकार बनाने का मौका नहीं देते, तो एक “सेक्युलर स्थिरता गठबंधन” के नाम पर DMK और AIADMK अस्थायी समझौता कर सकती हैं।

TVK विधायकों की सीधी चेतावनी
इसी संभावित समीकरण के खिलाफ TVK ने अब खुली चेतावनी दी है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, यदि DMK और AIADMK मिलकर सरकार बनाने की कोशिश करती हैं, तो TVK के सभी विधायक सामूहिक इस्तीफा देने पर विचार कर सकते हैं।

TVK नेताओं का कहना है कि जनता ने इस चुनाव में पारंपरिक द्रविड़ राजनीति को नकारकर बदलाव के लिए वोट दिया है। ऐसे में अगर चुनाव में हार झेलने वाली पार्टियां केवल सत्ता बचाने के लिए साथ आती हैं, तो यह जनादेश का अपमान होगा।

पार्टी के कई नेताओं ने यह भी कहा कि जनता ने विजय को नई राजनीति के प्रतीक के रूप में चुना है और अगर उन्हें सत्ता से दूर रखने के लिए “अप्राकृतिक गठबंधन” बनाया जाता है, तो TVK सड़क से लेकर विधानसभा तक बड़ा आंदोलन करेगी।

विजय की राजनीति ने कैसे बदला तमिलनाडु?
विजय की राजनीतिक एंट्री को तमिलनाडु की राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव माना जा रहा है। राज्य में लंबे समय से द्रविड़ राजनीति का दबदबा रहा है। लेकिन TVK ने युवाओं, पहली बार वोट देने वाले मतदाताओं और शहरी वर्ग में जबरदस्त समर्थन हासिल किया।

विश्लेषकों का मानना है कि विजय ने खुद को “भ्रष्टाचार मुक्त विकल्प” के रूप में पेश किया। उनकी सोशल मीडिया रणनीति, फैन क्लब नेटवर्क और आक्रामक प्रचार अभियान ने चुनावी माहौल बदल दिया। कई राजनीतिक विशेषज्ञों ने उनकी तुलना पूर्व मुख्यमंत्री एम. जी. रामचंद्रन और जे. जयललिता से भी की है।

कांग्रेस की भूमिका भी बनी चर्चा का विषय
तमिलनाडु के इस राजनीतिक संकट में कांग्रेस की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है। चुनाव के बाद कांग्रेस ने DMK से दूरी बनाते हुए TVK को समर्थन देने के संकेत दिए। इससे DMK नाराज हो गई और पार्टी ने कांग्रेस पर “राजनीतिक चरित्र बदलने में विफल रहने” का आरोप लगाया।

कांग्रेस के इस रुख ने विपक्षी राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। माना जा रहा है कि अगर कांग्रेस खुलकर विजय के साथ आती है, तो दक्षिण भारत की राजनीति में नया समीकरण बन सकता है।

AIADMK ने भी बदली रणनीति
इधर AIADMK ने भी अपने विधायकों को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें रिसॉर्ट में भेज दिया है। माना जा रहा है कि पार्टी को डर है कि मौजूदा राजनीतिक अनिश्चितता में विधायकों की टूट-फूट हो सकती है।

AIADMK ने पहले TVK को बिना शर्त समर्थन देने की बात कही थी, लेकिन बाद में पार्टी ने पीछे हटते हुए कहा कि वह DMK के साथ किसी भी प्रकार का गठबंधन नहीं करेगी।

क्या तमिलनाडु में फिर होंगे चुनाव?
अगर विजय बहुमत साबित नहीं कर पाते और विपक्षी दल भी स्थिर सरकार नहीं बना पाते, तो तमिलनाडु में संवैधानिक संकट गहरा सकता है। ऐसी स्थिति में राज्यपाल के पास राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करने या फिर दोबारा चुनाव कराने का विकल्प हो सकता है।

हालांकि राजनीतिक जानकारों का मानना है कि किसी भी दल के लिए दोबारा चुनाव आसान विकल्प नहीं होगा। चुनाव में भारी खर्च और जनता के मूड को देखते हुए सभी दल पहले सत्ता का रास्ता निकालने की कोशिश करेंगे।

स्टालिन का बयान भी चर्चा में
पूर्व मुख्यमंत्री M. K. Stalin ने हाल ही में कहा कि अगर विजय सरकार बनाते हैं, तो DMK छह महीने तक उनकी सरकार को परेशान नहीं करेगी।

स्टालिन के इस बयान को कई राजनीतिक विश्लेषकों ने रणनीतिक कदम बताया। माना जा रहा है कि DMK फिलहाल जनता के मूड को समझने की कोशिश कर रही है और सीधे टकराव से बचना चाहती है।

आगे क्या?
तमिलनाडु की राजनीति अब पूरी तरह राज्यपाल के अगले फैसले पर टिकी हुई है। अगर विजय पर्याप्त समर्थन जुटा लेते हैं, तो वे राज्य के अगले मुख्यमंत्री बन सकते हैं। लेकिन अगर संख्या बल उनके खिलाफ जाता है, तो राज्य में बड़ा राजनीतिक और संवैधानिक संकट पैदा हो सकता है।

TVK विधायकों की सामूहिक इस्तीफे की चेतावनी ने इस पूरे घटनाक्रम को और अधिक गंभीर बना दिया है। इससे साफ है कि विजय और उनकी पार्टी सत्ता से बाहर रहने की स्थिति में आक्रामक राजनीतिक लड़ाई लड़ने के मूड में हैं।

तमिलनाडु की राजनीति में यह घटनाक्रम केवल सरकार गठन का संकट नहीं, बल्कि राज्य की दशकों पुरानी राजनीतिक व्यवस्था के बदलने का संकेत भी माना जा रहा है।

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