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कोलकाता के सरकारी स्कूलों में अब ISKCON देगा मिड-डे मील, मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने किया बड़ा ऐलान

जुलाई 16, 2026 (अंतिम अद्यतन: जून 23, 2026) 1 मिनट पढ़ें
ISKCON to provide mid-day meals

मिड-डे मील की गुणवत्ता सुधारने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार का बड़ा फैसला
कोलकाता। पश्चिम बंगाल की भाजपा सरकार ने राज्य के सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील व्यवस्था को लेकर एक बड़ा फैसला लिया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने घोषणा की है कि कोलकाता नगर क्षेत्र के सरकारी स्कूलों में अब इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शसनेस (ISKCON) मिड-डे मील की आपूर्ति करेगी। इस योजना को फिलहाल एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू किया जाएगा।

राज्य सरकार का कहना है कि पिछले वर्षों में मिड-डे मील की गुणवत्ता को लेकर कई शिकायतें सामने आई थीं। कई बार भोजन में छिपकली, कॉकरोच और अन्य अशुद्ध वस्तुएं मिलने की खबरों ने व्यवस्था पर सवाल खड़े किए थे। इसी पृष्ठभूमि में सरकार ने भोजन की गुणवत्ता और पोषण स्तर सुधारने के लिए यह कदम उठाया है।

प्रति छात्र भोजन बजट बढ़ाकर 10 रुपये किया गया
विधानसभा में बजट पेश होने के बाद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने बताया कि अब तक मिड-डे मील के लिए प्रति छात्र प्रतिदिन लगभग 6.50 रुपये का प्रावधान था, जिसे बढ़ाकर 10 रुपये कर दिया गया है।

उन्होंने कहा कि इस अतिरिक्त राशि से छात्रों को अधिक पौष्टिक और गुणवत्तापूर्ण भोजन उपलब्ध कराया जा सकेगा। साथ ही मिड-डे मील तैयार करने वाले रसोइयों के मानदेय में भी प्रति माह 1,000 रुपये की वृद्धि की गई है।

“हरे कृष्ण बोलना जरूरी नहीं” – शुभेंदु अधिकारी
बजट के बाद पत्रकारों से बातचीत में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि पश्चिम बंगाल स्वामी विवेकानंद, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, रामकृष्ण मिशन, भारत सेवाश्रम संघ, गौड़ीय मठ और ISKCON जैसे संस्थानों की सांस्कृतिक विरासत के मार्ग पर आगे बढ़ेगा।

उन्होंने कहा,

“हम ISKCON को मिड-डे मील आपूर्ति की जिम्मेदारी दे रहे हैं। शुरुआत कोलकाता से होगी। यदि किसी को ‘हरे कृष्ण’ बोलने में आपत्ति है तो वह मत कहे। कोई किसी पर दबाव नहीं डालेगा। छात्रों को अच्छा और शुद्ध भोजन मिलेगा, यही हमारी प्राथमिकता है।”

मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस भी शुरू हो गई है। कुछ लोग इसे भोजन की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में सकारात्मक कदम मान रहे हैं, जबकि कुछ विपक्षी दलों ने धार्मिक संगठन को सरकारी योजना से जोड़ने पर सवाल उठाए हैं।

ISKCON का दावा – 2004 से चला रहे हैं मिड-डे मील कार्यक्रम
ISKCON कोलकाता के उपाध्यक्ष राधारमण दास ने बताया कि संगठन वर्ष 2004 से मिड-डे मील परियोजनाओं से जुड़ा हुआ है। वर्तमान में दिल्ली, महाराष्ट्र सहित देश के आठ राज्यों में ISKCON लाखों छात्रों को भोजन उपलब्ध करा रहा है।

उन्होंने कहा कि संस्था गौड़ीय वैष्णव परंपरा के अनुसार पूर्णतः शाकाहारी भोजन परोसती है। हालांकि भोजन में प्रोटीन की कमी को लेकर उठ रहे सवालों पर उन्होंने स्पष्ट किया कि मेन्यू में सोयाबीन, राजमा, पनीर और अन्य उच्च प्रोटीन वाले खाद्य पदार्थ शामिल किए जाएंगे।

कोलकाता में केंद्रीय रसोई मॉडल लागू करना चुनौतीपूर्ण
राधारमण दास ने बताया कि हरियाणा जैसे राज्यों में ISKCON एक विशाल केंद्रीय रसोईघर से लाखों बच्चों के लिए भोजन तैयार करता है। लेकिन कोलकाता की यातायात व्यवस्था और भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए वही मॉडल यहां लागू करना कठिन हो सकता है।

उन्होंने कहा कि शिक्षा विभाग के साथ चर्चा के बाद यह तय किया जाएगा कि भोजन स्थानीय स्तर पर तैयार किया जाएगा या किसी अन्य मॉडल को अपनाया जाएगा।

छात्रों को क्या मिलेगा खाने में?
ISKCON की ओर से प्रस्तावित साप्ताहिक भोजन सूची में निम्नलिखित व्यंजन शामिल हैं:

सोमवार
चावल
सोयाबीन की सब्जी

मंगलवार
चावल
दाल
आलू चोखा

बुधवार
पुलाव
मटर पनीर

गुरुवार
चावल
कद्दू-चना सब्जी

शुक्रवार
चावल
मिक्स वेजिटेबल या काबुली चना सब्जी

शनिवार
खिचड़ी
पापड़
मिठाई

अंडे को लेकर उठे सवाल
ISKCON द्वारा संचालित भोजन व्यवस्था पूरी तरह शाकाहारी होती है। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या भविष्य में पश्चिम बंगाल के छात्रों को मिड-डे मील में अंडा मिलेगा या नहीं।

फिलहाल सरकार और शिक्षा विभाग की ओर से इस संबंध में कोई अंतिम घोषणा नहीं की गई है। हालांकि ISKCON का कहना है कि वह पशु-आधारित प्रोटीन के स्थान पर पौध-आधारित उच्च प्रोटीन खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराएगा।

शिक्षा और पोषण पर सरकार का फोकस
राज्य सरकार का दावा है कि यह निर्णय केवल भोजन वितरण की जिम्मेदारी बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य सरकारी स्कूलों में शिक्षा और पोषण की गुणवत्ता को बेहतर बनाना है। बजट में स्कूल अवसंरचना, छात्र सुविधाओं और पोषण योजनाओं के लिए अतिरिक्त प्रावधान किए गए हैं।

अब सभी की निगाहें इस पायलट प्रोजेक्ट पर होंगी कि ISKCON के जरिए मिड-डे मील व्यवस्था में कितना सुधार आता है और इसका छात्रों के स्वास्थ्य तथा शिक्षा पर क्या प्रभाव पड़ता है।

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