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नेतन्याहू का बड़ा बयान: “मैं वह हर काम नहीं करता जो ट्रंप चाहते हैं”, अमेरिका-इसराइल संबंधों में बढ़ी दूरी के संकेत

अगस्त 30, 2026 (अंतिम अद्यतन: जून 22, 2026) 1 मिनट पढ़ें
बेंजामिन नेतन्याहू

ट्रंप की आलोचना के बाद पहली बार बोले नेतन्याहू, ईरान और लेबनान पर दोहराया सख्त रुख
यरूशलम। इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने अमेरिका और इसराइल के रिश्तों को लेकर एक महत्वपूर्ण बयान देते हुए कहा है कि वह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हर इच्छा के अनुसार काम नहीं करते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि दोनों देशों के बीच गहरे संबंध होने के बावजूद इसराइल अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और हितों के आधार पर स्वतंत्र निर्णय लेता है।

नेतन्याहू का यह बयान ऐसे समय में आया है जब हाल के दिनों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने सार्वजनिक रूप से इसराइल की नीतियों, विशेषकर लेबनान और हिज़्बुल्लाह को लेकर अपनाए गए रवैये की आलोचना की थी।

“न मैं ट्रंप को नियंत्रित करता हूं, न ट्रंप मुझे”
यरूशलम में आयोजित जेएनएस इंटरनेशनल पॉलिसी समिट को संबोधित करते हुए नेतन्याहू ने कहा कि दोनों देशों में लोगों के बीच कई तरह की गलतफहमियां हैं।

उन्होंने कहा,

“अमेरिका में कुछ लोग मानते हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप वही करते हैं जो मैं उनसे कहता हूं। वहीं इसराइल में कुछ लोग सोचते हैं कि मैं वही करता हूं जो ट्रंप चाहते हैं। सच्चाई यह है कि दोनों में से कोई भी बात सही नहीं है।”

नेतन्याहू ने आगे कहा कि अमेरिका और इसराइल दोनों संप्रभु और स्वतंत्र राष्ट्र हैं तथा उनके नेता अपने-अपने राष्ट्रीय हितों के लिए जिम्मेदार हैं।

उन्होंने कहा,

“हम अक्सर एक जैसी सोच रखते हैं, लेकिन कई बार हमारी राय अलग भी होती है। मैं इसराइल की सुरक्षा और उसके हितों के लिए खड़ा हूं।”

ईरान पर फिर दोहराया कड़ा संदेश
अपने संबोधन में नेतन्याहू ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि इसराइल किसी भी कीमत पर ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देगा।

उन्होंने कहा कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर इसराइल की नीति में कोई बदलाव नहीं आया है और देश अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाता रहेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका-ईरान शांति समझौते के बाद भी इसराइल का रुख पहले की तरह आक्रामक बना हुआ है। यही कारण है कि हाल के दिनों में वॉशिंगटन और तेल अवीव के बीच कुछ रणनीतिक मतभेद भी सामने आए हैं।

दक्षिणी लेबनान में सेना बनाए रखने का ऐलान
नेतन्याहू ने दक्षिणी लेबनान में इसराइली सैन्य मौजूदगी को लेकर भी महत्वपूर्ण बयान दिया।

उन्होंने कहा,

“हम दक्षिणी लेबनान के सुरक्षा क्षेत्र में तब तक मौजूद रहेंगे, जब तक हमारे नागरिकों और उत्तरी सीमा की सुरक्षा के लिए यह आवश्यक होगा।”

यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिका लगातार इसराइल को लेबनान में सैन्य कार्रवाई सीमित करने की सलाह दे रहा है।

ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से की थी आलोचना
पिछले सप्ताह जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसराइल की सैन्य रणनीति पर खुलकर असहमति जताई थी।

ट्रंप ने कहा था कि हिज़्बुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर पूरे क्षेत्रों को तबाह करना उचित नहीं है क्योंकि वहां बड़ी संख्या में आम नागरिक भी रहते हैं।

उन्होंने कहा,

“जब आप किसी संगठन को निशाना बना रहे हों तो पूरे इलाके को नष्ट कर देना समझदारी नहीं है। वहां रहने वाले सभी लोग हिज़्बुल्लाह के सदस्य नहीं हैं।”

ट्रंप ने यह भी सुझाव दिया था कि सीरिया को हिज़्बुल्लाह से निपटने का अवसर दिया जाना चाहिए और इसराइल को अधिक संयम बरतना चाहिए।

“मेरे बिना इसराइल नहीं होता” – ट्रंप
अपने बयान में ट्रंप ने इसराइल के साथ अमेरिका के संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा था कि उनके कार्यकाल में इसराइल को जितना समर्थन मिला, उतना किसी अन्य अमेरिकी राष्ट्रपति ने नहीं दिया।

उन्होंने कहा,

“मेरे बिना इसराइल नहीं होता, क्योंकि मैंने उनके लिए वह सब किया जो किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने पहले कभी नहीं किया।”

हालांकि ट्रंप ने यह भी कहा कि उनके और नेतन्याहू के बीच व्यक्तिगत संबंध अभी भी अच्छे हैं, लेकिन इसराइल को लेबनान के मामले में अधिक जिम्मेदारी दिखाने की आवश्यकता है।

जेडी वेंस की भी चेतावनी
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी हाल ही में इसराइली नेताओं को अप्रत्यक्ष रूप से चेतावनी दी थी।

उन्होंने कहा कि पिछले तीन महीनों में इसराइल की रक्षा के लिए उपयोग किए गए अधिकांश रक्षा उपकरण अमेरिका ने उपलब्ध कराए हैं और उनका खर्च अमेरिकी करदाताओं ने वहन किया है।

वेंस ने कहा,

“दुनिया में केवल डोनाल्ड ट्रंप ही ऐसे नेता हैं जो इसराइल का मजबूती से समर्थन कर रहे हैं। ऐसे में इसराइली नेताओं को अमेरिका के खिलाफ सार्वजनिक बयानबाजी से बचना चाहिए।”

विश्लेषकों का मानना है कि यह टिप्पणी इसराइल के उन मंत्रियों के लिए थी जिन्होंने हाल में अमेरिका-ईरान समझौते की आलोचना की थी।

भाई योनी नेतन्याहू को किया याद
अपने भाषण के दौरान बिन्यामिन नेतन्याहू भावुक भी दिखाई दिए। उन्होंने अपने बड़े भाई लेफ्टिनेंट कर्नल योनाथन (योनी) नेतन्याहू को याद किया, जिनकी 1976 में प्रसिद्ध एन्तेबे ऑपरेशन के दौरान मृत्यु हो गई थी।

योनी नेतन्याहू उस सैन्य अभियान का नेतृत्व कर रहे थे जिसमें युगांडा के एन्तेबे हवाई अड्डे पर अपहृत एयर फ्रांस विमान के यात्रियों को छुड़ाया गया था।

यह ऑपरेशन सैन्य इतिहास के सबसे साहसिक बचाव अभियानों में गिना जाता है। इस मिशन में सभी बंधकों को सफलतापूर्वक बचा लिया गया था, लेकिन योनी नेतन्याहू शहीद हो गए थे।

नेतन्याहू ने कहा कि उनके भाई का बलिदान इसराइल की सुरक्षा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को आज भी प्रेरित करता है।

अमेरिका-इसराइल संबंधों के लिए क्या मायने?
नेतन्याहू का यह बयान ऐसे समय आया है जब मध्य पूर्व की राजनीति तेजी से बदल रही है। अमेरिका-ईरान समझौते के बाद क्षेत्रीय समीकरणों में बदलाव देखने को मिल रहा है, जबकि इसराइल अभी भी ईरान और हिज़्बुल्लाह को अपनी सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती मानता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप और नेतन्याहू के बीच व्यक्तिगत संबंध मजबूत बने रहने के बावजूद दोनों देशों की रणनीतिक प्राथमिकताओं में अंतर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है।

हालांकि दोनों नेताओं ने एक-दूसरे के प्रति सम्मान जताया है, लेकिन हालिया बयान इस बात का संकेत देते हैं कि अमेरिका और इसराइल अब हर मुद्दे पर एकमत नहीं हैं। आने वाले महीनों में ईरान, लेबनान और क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर दोनों देशों के बीच मतभेद और स्पष्ट हो सकते हैं।

बिन्यामिन नेतन्याहू का यह बयान केवल अमेरिका-इसराइल संबंधों पर टिप्पणी नहीं है, बल्कि यह इसराइल की स्वतंत्र विदेश और सुरक्षा नीति का सार्वजनिक प्रदर्शन भी है। ट्रंप और वेंस की आलोचना के बाद दिया गया यह संदेश बताता है कि तेल अवीव अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है, भले ही उसके सबसे करीबी सहयोगी अमेरिका की राय अलग क्यों न हो।

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