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पाकिस्तान में फिर लौटे हिंदू-सिख नाम! कृष्ण नगर से लक्ष्मी चौक तक, आखिर क्यों बदली जा रही है लाहौर की पहचान?

अक्टूबर 15, 2026 (अंतिम अद्यतन: मई 20, 2026) 1 मिनट पढ़ें
पाकिस्तान में हिंदू और सिख नामों की वापसी

पाकिस्तान में हिंदू और सिख नामों की वापसी

पाकिस्तान के लाहौर शहर में इन दिनों एक बड़ा सांस्कृतिक और राजनीतिक बदलाव चर्चा का विषय बना हुआ है। जिन इलाकों, सड़कों और चौकों के नाम कभी हिंदू, सिख और ब्रिटिश दौर से जुड़े हुआ करते थे, उन्हें अब फिर से बहाल किया जा रहा है।

कृष्ण नगर, संत नगर, धर्मपुरा और लक्ष्मी चौक जैसे नाम एक बार फिर आधिकारिक पहचान बनते दिखाई दे रहे हैं। पाकिस्तान में इसे “हेरिटेज रिवाइवल” यानी ऐतिहासिक विरासत को पुनर्जीवित करने की कोशिश बताया जा रहा है। वहीं कई विशेषज्ञ इसे देश में चल रही “डी-रेडिकलाइजेशन” प्रक्रिया से भी जोड़कर देख रहे हैं।

आखिर क्यों लौट रहे हैं पुराने नाम?
1947 के विभाजन से पहले लाहौर को दक्षिण एशिया के सबसे सांस्कृतिक और बहुधार्मिक शहरों में गिना जाता था। यहां हिंदू, सिख और मुस्लिम समुदाय साथ रहते थे। शहर के कई इलाके, बाजार और सड़कें हिंदू देवी-देवताओं, सिख हस्तियों और पुराने सामाजिक समुदायों के नाम पर थीं।

लेकिन विभाजन के बाद पाकिस्तान बनने के साथ ही बड़ी संख्या में हिंदू और सिख भारत चले गए। इसके बाद कई इलाकों के नाम बदल दिए गए ताकि शहर की नई पहचान बनाई जा सके।

अब करीब आठ दशक बाद पाकिस्तान में एक नई बहस शुरू हुई है कि क्या इतिहास को पूरी तरह मिटाया जा सकता है? इसी सोच के तहत पुराने नामों को फिर से अपनाने की शुरुआत हुई है।

कौन-कौन से नाम बदले गए?
लाहौर में कई पुराने नामों को फिर से बहाल किया गया है। इनमें कई बेहद प्रसिद्ध इलाके और सड़कें शामिल हैं।

बदले गए प्रमुख नाम:
इस्लामपुरा का नाम फिर से कृष्ण नगर (Krishan Nagar) कर दिया गया
सुन्नत नगर अब दोबारा संत नगर (Sant Nagar) कहलाने लगा है
मुस्तफाबाद को फिर से धर्मपुरा (Dharampura) नाम दिया गया
हमीद निज़ामी रोड अब फिर टेम्पल स्ट्रीट (Temple Street) के नाम से जानी जा रही है
निश्तर रोड का पुराना नाम ब्रैंडरेथ रोड (Brandreth Road) बहाल कर दिया गया
रहमान गली अब दोबारा राम गली (Ram Gali) कहलाती है
बाबरी मस्जिद चौक का नाम फिर जैन मंदिर रोड (Jain Mandir Road) कर दिया गया
ग़ाज़ियाबाद को वापस कुम्हारपुरा (Kumharpura) नाम दिया गया
जीलानी रोड अब फिर आउटफॉल रोड (Outfall Road) कहलाने लगी है
फ़ातिमा जिन्ना रोड का पुराना नाम क्वीन्स रोड (Queen’s Road) बहाल किया गया
अल्लामा इक़बाल रोड अब दोबारा जेल रोड (Jail Road) के नाम से जानी जा रही है
सर आगा खान रोड को फिर से डेविस रोड (Davies Road) कर दिया गया
बाग़-ए-जिन्नाह रोड का नाम वापस लॉरेंस रोड (Lawrence Road) रखा गया
शाहरा-ए-अब्दुल हमीद बिन बादीस अब फिर एम्प्रेस रोड (Empress Road) कहलाती है
मौलाना ज़फ़र अली खान चौक को दोबारा लक्ष्मी चौक (Laxmi Chowk) नाम दिया गया

लाहौर के बदलते स्थानों के नाम

डी-रेडिकलाइजेशन से कैसे जुड़ा है मामला?
विशेषज्ञों के मुताबिक पाकिस्तान पिछले कुछ वर्षों से अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि सुधारने की कोशिश कर रहा है। “डी-रेडिकलाइजेशन” यानी कट्टरपंथी सोच को कम करने और समाज को अधिक उदार बनाने की चर्चा वहां लगातार बढ़ रही है।

ऐसे में पुराने हिंदू और सिख नामों की वापसी केवल प्रशासनिक फैसला नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे एक सांस्कृतिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है।

पाकिस्तान के कुछ बुद्धिजीवियों का कहना है कि देश की पहचान सिर्फ 1947 के बाद की नहीं है, बल्कि सिंधु घाटी सभ्यता, हिंदू, बौद्ध और सिख इतिहास भी उसकी विरासत का हिस्सा हैं।

क्या पाकिस्तान अपनी पुरानी पहचान स्वीकार कर रहा है?
इतिहासकार मानते हैं कि लाहौर, कराची और रावलपिंडी जैसे शहरों की असली पहचान हमेशा बहुसांस्कृतिक रही है।

लक्ष्मी चौक, कृष्ण नगर और धर्मपुरा जैसे नाम केवल शब्द नहीं थे, बल्कि वे उस दौर की सामाजिक संरचना और साझा संस्कृति का प्रतीक थे।

कई स्थानीय लोग आज भी पुराने नामों का इस्तेमाल करते हैं। सोशल मीडिया पर भी पाकिस्तान की नई पीढ़ी पुराने नक्शे, तस्वीरें और दस्तावेज साझा कर रही है, जिससे लोगों में अपने शहरों के इतिहास को जानने की दिलचस्पी बढ़ी है।

अंतरराष्ट्रीय छवि सुधारने की कोशिश?
विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान इन कदमों के जरिए दुनिया को यह संदेश देना चाहता है कि वह धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता का सम्मान करता है।

करतारपुर कॉरिडोर खोलने के बाद से पाकिस्तान लगातार सिख धार्मिक स्थलों को लेकर सक्रिय दिखाई दिया है। अब हिंदू और सिख नामों की वापसी को भी उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

हालांकि आलोचक कहते हैं कि सिर्फ नाम बदलना काफी नहीं है। अगर पाकिस्तान वास्तव में बहुसांस्कृतिक पहचान अपनाना चाहता है तो उसे अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक समानता पर भी ठोस कदम उठाने होंगे।

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस
इन बदलावों के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।

कुछ लोग इसे पाकिस्तान में सकारात्मक बदलाव और इतिहास को स्वीकार करने की शुरुआत बता रहे हैं। वहीं कुछ लोग इसे केवल “इमेज मेकओवर” यानी दुनिया के सामने नरम चेहरा दिखाने की कोशिश मान रहे हैं।

लेकिन इतना तय है कि पाकिस्तान अब अपने उस अतीत की तरफ लौटकर देख रहा है, जिसे लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया।

क्या बदल जाएगा पाकिस्तान का नैरेटिव?
अगर आने वाले समय में और पुराने नाम बहाल होते हैं, तो यह पाकिस्तान की पहचान और राजनीतिक सोच में बड़ा बदलाव माना जाएगा।

यह सिर्फ सड़कों और मोहल्लों के नाम बदलने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस इतिहास को दोबारा स्वीकार करने की कोशिश है जिसे कभी भुला देने की कोशिश की गई थी।

लाहौर में लौटते ये पुराने नाम बता रहे हैं कि इतिहास चाहे जितना दबा दिया जाए, उसकी पहचान पूरी तरह मिटाई नहीं जा सकती।

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