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ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद नेता कैसे बने तृणमूल के लिए सबसे बड़ा संकट? जानिए ऋतब्रत बनर्जी की पूरी कहानी

जुलाई 13, 2026 (अंतिम अद्यतन: जून 4, 2026) 1 मिनट पढ़ें
बंगाल में तृणमूल का संकट

तृणमूल कांग्रेस में बगावत से बंगाल की राजनीति में भूचाल
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है जिसने राज्य की सियासत को पूरी तरह बदल कर रख दिया है। तृणमूल कांग्रेस के पूर्व नेता ऋतब्रत बनर्जी ने पार्टी से निष्कासन के कुछ ही समय बाद ऐसा राजनीतिक दांव खेला है जिसने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ा संकट खड़ा कर दिया है।

विधानसभा चुनाव में हार के बाद पहले से दबाव झेल रही तृणमूल कांग्रेस अब अंदरूनी बगावत से जूझ रही है। हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि पार्टी के 58 से अधिक विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुन लिया है। यह पहली बार है जब तृणमूल कांग्रेस के गठन के बाद पार्टी के भीतर इतनी बड़ी टूट देखने को मिली है।

कौन हैं ऋतब्रत बनर्जी?
15 नवंबर 1979 को कोलकाता में जन्मे ऋतब्रत बनर्जी ने अपनी राजनीतिक यात्रा वामपंथी छात्र संगठन एसएफआई (स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया) से शुरू की थी।

कोलकाता के साउथ प्वाइंट स्कूल से शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने आशुतोष कॉलेज और फिर कलकत्ता विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। छात्र जीवन से ही उनकी संगठन क्षमता और नेतृत्व कौशल की चर्चा होने लगी थी।

वर्ष 2008 में वे एसएफआई के राष्ट्रीय महासचिव बने और जल्द ही सीपीएम के युवा चेहरों में शामिल हो गए। तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के साथ उनकी निकटता ने उनके राजनीतिक कद को और बढ़ाया।

सीपीएम से राज्यसभा तक का सफर
वर्ष 2011 में सीपीएम ने उन्हें कोलकाता दक्षिण लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया था। हालांकि वे चुनाव हार गए, लेकिन पार्टी नेतृत्व ने उन पर भरोसा बनाए रखा।

2014 में मात्र 34 वर्ष की उम्र में उन्हें राज्यसभा भेजा गया। उस समय उन्हें सीपीएम का उभरता हुआ सितारा माना जाता था। लेकिन जल्द ही पार्टी के साथ उनके मतभेद बढ़ने लगे।

लक्जरी जीवनशैली, पार्टी नेतृत्व की आलोचना और संगठन के भीतर गुटबाजी के आरोपों ने उनकी मुश्किलें बढ़ा दीं। अंततः गंभीर आरोपों के बाद उन्हें सीपीएम से निष्कासित कर दिया गया।

ममता बनर्जी के करीबी कैसे बने?
सीपीएम से निकाले जाने के बाद ऋतब्रत बनर्जी का राजनीतिक भविष्य अनिश्चित दिखाई दे रहा था। लेकिन वर्ष 2018 में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया।

तृणमूल में शामिल होने के बाद उनका राजनीतिक ग्राफ तेजी से ऊपर गया। पहले उन्हें पार्टी के ट्रेड यूनियन संगठन में जिम्मेदारी मिली और बाद में राज्यसभा भेजा गया।

धीरे-धीरे वे ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद नेताओं में गिने जाने लगे। पार्टी के अंदर उनकी पहुंच बढ़ती गई और वे संगठन के महत्वपूर्ण चेहरों में शामिल हो गए।

अभिषेक बनर्जी से टकराव बना विवाद की जड़?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऋतब्रत बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के बीच लंबे समय से मतभेद चल रहे थे।

2026 विधानसभा चुनाव में भाजपा की मजबूत चुनौती के बावजूद ऋतब्रत उलूबेड़िया पूर्व सीट से जीतने में सफल रहे। लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और चुनावी रणनीतिकारों की आलोचना शुरू कर दी।

उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी को जमीनी कार्यकर्ताओं की बजाय कॉर्पोरेट शैली में चलाया जा रहा है। उनके इन बयानों ने तृणमूल नेतृत्व को असहज कर दिया।

ममता बनर्जी के लिए क्यों बना सबसे बड़ा संकट?
हाल ही में ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में 58 विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपकर उन्हें विधायक दल का नेता चुने जाने की जानकारी दी।

यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि तृणमूल कांग्रेस के 28 साल के इतिहास में पहली बार किसी नेता ने पार्टी के दो-तिहाई विधायकों को अपने साथ जोड़ने में सफलता हासिल की है।

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एक बगावत नहीं बल्कि तृणमूल कांग्रेस के अस्तित्व की चुनौती बन सकती है।

क्या बंगाल में बनेंगे ‘एकनाथ शिंदे’?
महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे द्वारा शिवसेना में की गई बगावत के बाद अब बंगाल में ऋतब्रत बनर्जी की तुलना उनसे की जा रही है।

हालांकि ऋतब्रत लगातार दावा कर रहे हैं कि वे अब भी तृणमूल कांग्रेस का हिस्सा हैं और ममता बनर्जी को ही अपना नेता मानते हैं। लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि मौजूदा घटनाक्रम पार्टी में बड़े विभाजन की ओर संकेत कर रहा है।

क्या तृणमूल कांग्रेस खत्म हो जाएगी?
यह सवाल आज बंगाल की राजनीति में सबसे अधिक पूछा जा रहा है। हालांकि अधिकांश राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि तृणमूल कांग्रेस की पहचान अब भी ममता बनर्जी के नाम और व्यक्तित्व से जुड़ी हुई है।

पार्टी को मिलने वाला जनसमर्थन काफी हद तक ममता बनर्जी के करिश्मे पर आधारित रहा है। ऐसे में केवल विधायकों का समर्थन किसी नेता को जनता के बीच समान लोकप्रियता नहीं दिला सकता।

फिर भी यह स्पष्ट है कि ऋतब्रत बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस के भीतर सबसे बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा कर दिया है।

एसएफआई के छात्र नेता से लेकर सीपीएम सांसद, फिर तृणमूल कांग्रेस के भरोसेमंद चेहरे और अब पार्टी के सबसे बड़े चुनौतीकर्ता तक का ऋतब्रत बनर्जी का सफर बेहद दिलचस्प रहा है।

उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा, संगठन क्षमता और नेतृत्व कौशल ने उन्हें हमेशा चर्चा में रखा। लेकिन अब वही नेता ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने खड़ा है।

आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस अपनी पकड़ बनाए रख पाती है या फिर ऋतब्रत बनर्जी एक नया राजनीतिक अध्याय लिखने में सफल होते हैं।

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