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पश्चिम बंगाल में बड़ा संवैधानिक फैसला, राज्यपाल आर एन रवि ने विधानसभा भंग की

जुलाई 16, 2026 (अंतिम अद्यतन: मई 7, 2026) 1 मिनट पढ़ें
पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ने विधानसभा को किया भंग

पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ने विधानसभा को किया भंग

पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय एक बेहद असाधारण और संवेदनशील दौर से गुजर रही है। विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अब तक अपने पद से इस्तीफ़ा नहीं दिया है, जबकि राज्यपाल R. N. Ravi ने गुरुवार को विधानसभा भंग करने की घोषणा कर दी। इस घटनाक्रम ने राज्य में संवैधानिक बहस और राजनीतिक टकराव को और तेज़ कर दिया है।

राज्यपाल की ओर से जारी आदेश में कहा गया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 174(2)(b) के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए 7 मई 2026 से पश्चिम बंगाल विधानसभा को भंग किया जाता है। इसके साथ ही राज्य की मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल औपचारिक रूप से समाप्त हो गया।

चुनाव नतीजों के बाद बढ़ा तनाव
हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की। पार्टी ने 207 सीटों पर जीत हासिल की, जबकि तृणमूल कांग्रेस सिर्फ 80 सीटों तक सिमट गई। सबसे बड़ा झटका तब लगा जब ममता बनर्जी अपने गढ़ भवानीपुर सीट से बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी से 15 हज़ार से अधिक वोटों से हार गईं।

नतीजों के बाद आमतौर पर निवर्तमान मुख्यमंत्री इस्तीफ़ा देकर नई सरकार के गठन का रास्ता साफ़ करते हैं, लेकिन ममता बनर्जी ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि उनकी हार “जनादेश से नहीं बल्कि साज़िश के जरिए” हुई है और इसलिए इस्तीफ़े का सवाल ही नहीं उठता।

क्या कहता है संविधान?
इस पूरे विवाद के बीच संविधान विशेषज्ञों और पूर्व चुनाव आयुक्तों की राय भी सामने आई है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाई. कुरैशी ने कहा कि ऐसी स्थिति बेहद दुर्लभ है और संविधान में इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता।

उनके मुताबिक, जब किसी सरकार के पास विधानसभा का बहुमत नहीं रह जाता, तब मुख्यमंत्री नैतिक और संवैधानिक रूप से पद पर बने नहीं रह सकते। हालांकि, विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने तक उन्हें जबरन हटाना आसान नहीं होता।

कुरैशी ने यह भी कहा कि यदि संवैधानिक संकट गहराता, तो राज्यपाल अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर सकते थे। हालांकि अब विधानसभा भंग हो चुकी है, इसलिए नई सरकार के गठन की प्रक्रिया जल्द शुरू होने की संभावना है।

पश्चिम बंगाल विधानसभा भंग

“यह प्रतीकात्मक विरोध है”
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी का इस्तीफ़ा न देना एक राजनीतिक संदेश देने की कोशिश है। कोलकाता के जेवियर कॉलेज के प्रोफेसर और ‘बैटलग्राउंड बंगाल’ के लेखक सायंतन घोष का कहना है कि ममता की राजनीति हमेशा संघर्ष और विरोध की शैली पर आधारित रही है।

उनके अनुसार, ममता यह दिखाना चाहती हैं कि चुनाव निष्पक्ष नहीं था और वह इस नतीजे को कानूनी चुनौती भी दे सकती हैं। हालांकि संवैधानिक रूप से उनके इस कदम का कोई बड़ा असर नहीं पड़ने वाला।

क्या राज्यपाल मुख्यमंत्री को हटा सकते हैं?
संविधान के अनुच्छेद 164(1) में कहा गया है कि मुख्यमंत्री और मंत्री “राज्यपाल की इच्छा” तक पद पर बने रहते हैं। लेकिन संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि इसका मतलब यह नहीं कि राज्यपाल मनमाने तरीके से मुख्यमंत्री को हटा सकते हैं।

प्रसिद्ध विधि विशेषज्ञ फैजान मुस्तफा का कहना है कि भारतीय लोकतंत्र में असली आधार विधानसभा का बहुमत होता है। यदि मुख्यमंत्री सदन का विश्वास खो दें, तो उनका पद पर बने रहना व्यावहारिक नहीं माना जाता।

बीजेपी ने क्या कहा?
बीजेपी ने ममता बनर्जी के रुख पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। पार्टी प्रवक्ता संबित पात्रा ने इसे “संवैधानिक ईशनिंदा” बताया। उनका कहना है कि यह लोकतांत्रिक परंपराओं और संविधान की भावना के खिलाफ है।

बीजेपी के अनुसार नई सरकार शनिवार को शपथ ले सकती है और पार्टी पहली बार पश्चिम बंगाल में सत्ता संभालने जा रही है।

विपक्ष ममता के समर्थन में
दूसरी ओर विपक्षी दलों के कई नेता ममता बनर्जी के समर्थन में उतर आए हैं। संजय राउत ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग केंद्र सरकार के दबाव में काम कर रहा है।

वहीं अखिलेश यादव गुरुवार को कोलकाता पहुंचे और ममता बनर्जी से मुलाकात की। मुलाकात के बाद उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल चुनाव में “बेईमानी” हुई है और विपक्ष को इस मुद्दे पर एकजुट होना चाहिए।

अब आगे क्या?
विधानसभा भंग होने के बाद अब संवैधानिक रूप से पुरानी सरकार का कार्यकाल समाप्त माना जाएगा। इसके बाद राज्यपाल नई विधानसभा के गठन की प्रक्रिया शुरू करेंगे, जिसमें नवनिर्वाचित विधायकों को शपथ दिलाई जाएगी और नई सरकार का गठन होगा।

हालांकि राजनीतिक तौर पर यह मामला यहीं खत्म होता नहीं दिख रहा। ममता बनर्जी आने वाले दिनों में चुनाव नतीजों को अदालत में चुनौती दे सकती हैं और बीजेपी के खिलाफ बड़ा राजनीतिक अभियान भी छेड़ सकती हैं।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में यह घटनाक्रम सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक परंपराओं, संवैधानिक मर्यादाओं और राजनीतिक संघर्ष की नई कहानी बनता जा रहा है।

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